आज अंबेडकर को खुद अपने ही भक्तों से लड़ना पड़ेगा !

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(डॉ.एम.एल.परिहार)
बहुत कड़वा सच है यह लेकिन वास्तविकता को नकार नहीं सकते. दरअसल हमने अंबेडकर को अपने अपने हिसाब से गढ लिया है, अपने अपने सांचे में ढाल दिया है . जिसमें हमारा स्वार्थ सधता है उसी अंबेडकर को याद करते हैं. बाबासाहेब अंबेडकर ने अकेले ही सामाजिक, शैक्षिक, बौद्धिक, आर्थिक, धार्मिक व राजनीतिक क्षेत्र में बेहतरीन संस्थाओं का निर्माण कर गौरवशाली स्थान तक पहुंचा कर ,देश के लिए महान योगदान कर दुनिया से विदा हुए. रात दिन दूसरों को कोसने वाले व अंबेडकर की पूजा कर माला जपने वाले उनके भक्तों ने अंबेडकर की धरोहर की जो दुर्दशा कर रखी है उस पर सिर्फ आंसू ही बहाए जा सकते है.
उन्होंने शिक्षा ,संगठन व संघर्ष का महान सूत्र दिया लेकिन हम खुद ही शिक्षित होकर ऊंचे पदों पर पहुंच कर धन जोड़कर समाज की चिंता भूल गये. खुद दलितों में एक ब्राह्मणवाद ने अवतार ले लिया.
अंबेडकर ने संसद की ओर इशारा क्या किया, आज हर कोई एमएलए एमपी बनने की  जुगाड़ में लगा हुआ है और जो वहां पहुंच जाता है वह समाज के लिए कभी मुंह नहीं खोलता हैं अंबेडकर विचारधारा को कुएं में फेंक अपने आका व पार्टी की चिलम भरने में ही खुद को धन्य मानता है. अंबेडकर के नाम पर तथा उनके सपनों को साकार करने का दावा करने वाली दलितों की दसों राजनीतिक पार्टियां व बड़े संगठन हैं लेकिन इनके लीडर साथ बैठना तो दूर एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते हैं. दूसरों को जोड़ने चले थे खुद ही बुरी तरह बिखर गये हैं.
   बाबासाहेब ने जोर दिया था कि बहुजन समाज वैचारिक व सांस्कृतिक रूप से एक हो जाए ,संगठित होएं. घर घर बुद्ध कबीर का साहित्य फैलाए. लेकिन पालना में हमने उनके बनाए संगठनों को कुड़े में फेंककर घर घर नई संस्थाएं बना डाली. जिसके पदों के लिए सड़क पर आए दिन चुनाव, हाथापाई से लेकर कोर्ट कचहरी में लड़ते रहते हैं.या स्वयंभू अध्यक्ष बन कर संस्थाओं पर सांप की तरह कुंडली मारे बैठे रहते हैं.और अपने वर्चस्व को हल्की सी चुनौती देने पर फुंफकारते है.
     बाबासाहेब ने आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उच्च स्तरीय शैक्षिक संस्थानों की स्थापना की ,पत्र पत्रिकाएं निकाली, रात दिन एक कर हर क्षेत्र के सैकड़ों ग्रंथों की रचना की. लेकिन घर घर बनी संस्थाओं ने इस मुहिम को आगे बढाने की बजाय खुद की संस्था की शाखाएं खोलना व फिजूलखर्ची ज्यादा की.और तो और शिक्षा से जुड़े शिक्षाविदों ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया. 
     बाबासाहेब ने हर धर्म का लंबे समय तक गहराई से अध्ययन कर वैज्ञानिक व मानवतावादी बुद्ध और धम्म मार्ग बताया लेकिन हमारे कथित पढे लिखे लोग भी उनके इस फैसले पर सवाल खड़े करते है और आज भी अंधविश्वास में आकंठ डूबे हुए हैं. जो बुद्ध के नाम पर थोड़ा आगे बढे है उनमें से अधिकतर ने सिर्फ सरनेम ‘बौद्ध’ लगाकर इतिश्री मान ली और बौद्ध धर्म के नाम पर नए कर्मकांडों को अपना लिया. न धम्म के शीलों का पालन करते हैं और न धम्म प्रचार. बस बौद्ध धर्म के भक्त बन गए. इस खाज में कोढ का काम किया भिक्षुओं ने. अधिकतर भिक्षु अध्ययन, भ्रमण, देशना, ध्यान व धम्म प्रचार की बजाय शादी ब्याह कराने, परिवार का पेट भराई , दक्षिणा व बुद्ध विहारों को डेरा जमाने में ही ध्यान लगाते हैं. 
जिन लोगों को 1956 में ही बाबासाहेब ने धम्म दे दिया था उन्होंने भी इसे फैलाने में कोई रूचि नहीं ली. इसे मराठी और महाराष्ट्र से बाहर नहीं जाने दिया. उल्टा उन्होंने बाबासाहेब के सारे संगठनों के टुकड़े टुकड़े कर सत्यानाश कर दिया. उनकी अनमोल बौद्धिक धरोहर को जन जन तक फैलाना तो दूर खुद ही भटक गए और दूसरों को इतना कोसा कि बुद्ध व अंबेडकर को घृणा के पात्र बन गए.
  आज युवा पीढी एक चौराहे पर है.अंबेडकर के नाम पर पुराने नेताओं से मोहभंग होता है तो बार बार नए लीडर उभर कर आते है लेकिन अंबेडकर को पढने, जीवन में उतारने व वैचारिक बौद्धिक परिपक्वता की बजाय गुस्सा ,टकराव, गाली गलौज, बात बात पर धरना प्रदर्शन, भारतबंद ,प्रदेश बंद से बहुजनों की बुनियादी जरूरतों के गंभीर मुद्दें भी कानूनी कारवाईयों की भेंट चढ जाते हैं. अंबेडकर के नाम पर युवाओं ने कई संगठन बना रखे हैं .गले में नीला गमछा डाल, जय भीम का जयकारा कर युवा सड़कों पर उमड़ता है लेकिन शिक्षा रोजगार व धन की कमी के कारण जल्दी ही टूट जाता है,चिंतन ,विचार व दिशा नहीं है. अंबेडकर के भक्त ज्यादा है अनुयायी कम. 
    आरक्षण के लाभ से धनवान बनी पहली रिटायर्ड पीढी पर समाज को संभालने की जिम्मेदारी थी लेकिन वह ऐशोआराम, शराब, टीवी, तीर्थ यात्रा, राजनीति या ताश के पत्तों में ही मदहोश हैं. भूल से बात अंबेडकर की करते हैं लेकिन घर परिवार में सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास व धार्मिक कर्मकांड ज्यो के त्यों हैं. नौकरी के दौरान वंचित वर्ग की पैरवी करने की बजाय उसे प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मदद के लिए सरकारी नियमों का रोना रोया और अब न शरीर साथ दे रहा है न मन. अब जिंदगी घर के कमरे में उपेक्षित व गुमनाम असहाय हो गई है.
बाबासाहेब का कारवां कहता है ..”विरोधियों का मुकाबला कर असहनीय कष्टों को सहन कर इस कारवां को यहां तक लाया हूं, हो सके आगे बढाना लेकिन किसी भी दशा में पीछे मत जाने देना, यही मेरा आखिरी संदेश है”.
 भला दूसरों को क्या दोष दें..आज अंबेडकर खुद लौटकर आ जाए तो उन्हें अपने भक्तों से ही लड़ना पड़ेगा. 
(एम एल परिहार) 

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