हाथ पसारना शौक नहीं , मजबूरी है इनकी

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– रमेश डांगरीवाल  “अंश “
तीन चार रोज पहले की बात है, मैं और मेरी पत्नी दोनों बाजार में कुछ खरीदारी करने गए . पत्नी ने कहा मैं मेरे कुछ जरूरी सामान ले लेती हूं ,आप भी अपना कोई आवश्यक काम हो तो उसे निपटा लो .हम दोनों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए , मैं थोड़ा जल्दी ही कार्य से फ्री हो गया तो एक जगह रुक कर के उनके आने का इंतजार करने लगा .


तभी पीछे से कानों में एक आवाज सुनाई दी -‘ओ बाबूजी, ओ बाबूजी भूखा हूं खाने को 2- 5 रुपए हो तो दीजिए  बाबूजी !’ पीछे मुड़कर देखा थो लगभग 65 -70 वर्ष का एक बुजुर्ग हाथ में लाठी, कंधे पर छोटी सी पोटली, जिसमें उसके आवश्यक कपड़े और कुछ जरूरी सामान बंधा हुआ था.पैरों में फटे पुराने जूते पहने हुए, बदन पर धोती और कुर्ती पहने हुए हाथ में कुछ छुट्टे पैसे लिए हुए चंद पैसे की आस में मेरी तरफ देख रहा था .

 
उम्र और अवस्था के अनुसार आंखों की रोशनी भी टीमटिमाने लग गई, बालों में पूरी तरह सफेदी छा गई ,कान भी धीरे धीरे साथ कम देते दिखाई दे रहे थे. कपड़े पूरी तरह मेले कुचले थे. चलने में बड़ी कठिनाई हो रही थी ,धीमे कदमों से अपना रास्ता नाप रहा था .


मैंने कहा -बासा चाय पियो तो दिलवा दूँ, उन्होंने कहा- नहीं, नहीं बाबूजी मुझे चाय पीने से गर्मी बहुत होती है इसलिए मैं चाय नहीं पीता हूं.  तो फिर मैंने कहा- खाना खिलवा  दूं तो उन्होंने इंकार कर दिया कि यहां आस-पास खाना नहीं मिलता है और यदि मिलता भी होगा ,तो बहुत महंगा मिलता होगा. आप तो मेरे को पांच दस रूपये  दे दो ,मैं वहां जाकर खा लूंगा .


वहां जाकर, मतलब कहां जाकर खा लोगे ?तो वह बुजुर्ग बोला- मैं रेलवे स्टेशन जाकर के खा लूंगा वहां पर ₹40 में भरपेट खाना मिल जाता है.


मैंने जेब में  से पर्स निकाला और 10 का नोट निकालकर बुजुर्ग को थमा दिया . भगवान आपका भला करें ,आपको सुखी रखे, ऐसी मंगल कामना करते हुए बुजुर्ग ने अपने कदम आगे बढ़ाए और पास में ही तीन मंजिला दुकान की छाया देखकर बुजुर्ग वहां बैठ गया .

 मैं उसे बड़े ध्यान से देखने लगा बुजुर्ग ने 5 मिनट आराम किया और उसके बाद मैली कुचली अपनी कुर्ती की जेब में हाथ डाला, कुर्ती पर जेब  कुछ अलग तरीके से बनाई हुई  दिखाई दे रही थी.जो बहुत बड़ी और एक थैले नुमा थी, उसमें से मुट्ठी भर के नोट निकाले और नोटों को सही तरीके से जमा कर अपनी कंधे  पर रखी पोटली  में डाल दिये.


जब वह  नोटों को अपनी पोटली में डाल रहा था, तो ऐसा लग रहा था कि उसे पोटली भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रही थी. उसकी कपडे की परतो  को वह टटोलकर ढूंढ रहा था, फिर उसने पैसे उसमे  डाल दिए ,ऐसा उसने चार पांच बार किया. उसने पैसों को गिने नहीं थे, अंदाजे से अगर देखा जाए तो 200 – ₹300 के आसपास थे, क्योंकि उसमें सारे नोट 10 -10 के ही थे.

 मेरे मन में भी उसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ गई थी. मैं उसके करीब गया और उनसे पूछा -बासा आप कहां रहते हो ….?  आपका गांव कौन सा है…?  एकबारगी तो वह सकपका गया, फिर बताया कि मैं यहीं  रेलवे स्टेशन पर रहता  हूं .गांव और परिवार के बारे में पूछा तो बताया कि मैं गंगापुर का रहने वाला हूं और मेरे परिवार में कोई भी नहीं है. मेरे बच्चे छोटी उम्र में  ही मर गए ,मेरी पत्नी भी मर गई, मैं अकेला ही हूं .

मेरा नाम मगनाराम बागरिया है ,परिवार के दूसरे लोग मुझे रोटी नहीं देते हैं, इसलिए मुझे भीख मांग करके मेरा गुजारा करना पड़ता है.मैं बहुत सालों से यहां  भीलवाड़ा में ही भीख  मांग  करके गुजारा करता हूं और रेलवे स्टेशन पर 40 रूपये में  खाना खाकर के  वही सो जाता हूं.यह सारी बातें बताते बताते उसकी आंखों में आंसू आने लग गए ,इस तरह बुढ़ापे में अपने आप को बेसहारा पाकर सबकी  हिम्मत टूट जाती है.


कुछ देर बाद उसने अपने धोती की अंटी से एक तंबाखु की पुडिया  निकाली , चुटकी भर तंबाखु होठो  के नीचे दबाई और फिर से पुडिया को अंटी दबा दिया .अपनी पोटली को कंधे पर रखा ,लाठी हाथ में पकड़ कर उठ खड़ा हुवा और उसी धीमी चाल से अपने कदम बढाते हुए अपनी मासूम और बेसहारा आवाज में लोगों के करीब जाकर बोलने लगा … ओ  बाबूजी… ओ माई… कुछ पैसे दे दो भूखा हूं रोटी खाऊंगा ! ईश्वर आपका भला करेगा… कहते हुए अपने कदम आगे बढ़ा रहा था.


मैं मन ही मन प्रार्थना कर रहा था कि हे प्रभु किसी को भी इस तरह से बुढ़ापे में बेसहारा मत करना कि उसे अपनी ही जिंदगी एक  बोझ लगने लगे .थोड़ी देर बाद मेरी पत्नी खरीददारी से फ्री हो कर आ गई और हम दोनों अपने घर के लिए रवाना हो गए …!

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