ये डॉ. श्याम सुंदर ज्याणी है !

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-विरमा राम 
बीकानेर के प्रतिष्ठित डूंगर कॉलेज में समाजशास्त्र पढ़ाते हैं, हालांकि मैं आज तक इन्हें वनस्पतिशास्त्र का शिक्षक/आचार्य मानता रहा था। ज्याणीजी पहली मर्तबा करीब 6 महीने पहले हमारे एक मित्र जितेन्द्र धारणिया जी के सौजन्य से बीकानेर में मिले। धारणिया जी ने राजस्थान के वन मंत्रीजी एवं मुझे इनके काम के बारे जानकारी देते हुए डूंगर कॉलेज का दौरा करने का आग्रह किया। उस वक़्त हम डूंगर कॉलेज नहीं जा पाए, एक तो बड़ी वजह थी समय की कमी एवं दूसरा हमारे द्वारा इनके काम को ज्यादा संजीदगी के साथ न लेना। 


पिछले महीने जयपुर के पास जामडोली में आयोजित 70वें राज्यस्तरीय वन महोत्सव में सूबे के मुखिया श्री अशोक गहलोत ने अपने भाषण में आम जनता से पौधारोपण का आह्वान करते हुए कहा कि, “अब भी कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें धुन सवार है, वो पागलपन की हद तक जाकर पेड़-पौधे लगाने का काम करते हैं। बीकानेर में एक प्रोफेसर हैं श्याम सुंदर ज्याणी। तनख्वाह अपनी मिलती है सरकार से, उसको खर्च करता है पेड़ लगाने के अंदर।” ‘ज्याणी’ अकेले ऐसे शख्स हैं जिनका मुख्यमंत्री ने अपने इस भाषण में एक उदाहरण के तौर पर जिक्र किया।


कार्यक्रम की समाप्ति के तुरंत बाद मैंने ज्याणीजी को फोन कर मुख्यमंत्री महोदय के उद्बोधन में उनके जिक्र के लिए बधाई दी एवं जयपुर आने का निमंत्रण दिया।वे पिछले हफ्ते जयपुर आये। राजस्थान सरकार के वन मंत्री सुखरामजी बिश्नोई ने संभावित 5-10 मिनट की मुलाकात की जगह मंत्रीजी ने ज्याणीजी के साथ पूरा एक घण्टा बिताया एवं वन विभाग से जुड़े विभिन्न मसलों पर उनसे राय जानी, साथ ही सुझाव भी मांगे।


ज्याणीजी से प्रभावित होना लाजमी था। मेरा खुद का डूंगर कॉलेज बीकानेर जाना हुआ। ज्याणीजी की मेहनत के नतीजे हतप्रभ करने वाले थे। कैसे एक उजाड़ जमीन को उन्होंने चमन में बदल दिया, वाकई प्रेरणादायक है। कभी विलायती बबूल (Prosopis juliflora) से पटा हुआ मैदान आज वनस्पति की विविधता के लिहाज से एक बेजोड़ नमूना है।


वे नित नए प्रयोग करते रहते हैं जिनके नतीजे1950 के दशक से ही थार मरुस्थल में वानिकी, कृषि आदि के कामों में जुटे केंद्र सरकार के प्रतिष्ठानों ‘केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसन्धान संस्थान (CAZRI)’, शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI) से भी बेहतर हैं।


गांधीजी, भगतसिंह, जसनाथजी, जाम्भोजी आदि को अपना आदर्श मानने वाले ज्याणी ने 2006 बीकानेर में हिमटसर से पारिवारिक वानिकी (Familial Forestry) की अवधारणा के साथ अपने अभियान की शुरुआत की, जो पिछले 13 सालों से एक मिशन के तौर पर निरंतर रूप से जारी है और अब तक मरुस्थल में करीब 9 लाख पौधे रोप चुके है। डॉ श्याम सुंदर ज्याणी को ‘पारिवारिक वानिकी’ अवधारणा का जनक कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस पूरे कॉन्सेप्ट को उन्होंने अपनी वेबसाइट http://familialforestry.org पर बखूबी समझाया है।


ज्याणी बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़ आदि जिलों के 150 स्कूलों में गांधीजी की 150वें जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में फलदार पौधों वाले ‘गांधी उद्यान’ विकसित करने में लगे हुए हैं। मुझे भी 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन डूंगर कॉलेज बीकानेर में ज्याणीजी के साथ एक ‘जाळ’ के पौधे को लगाने का सौभाग्य मिला। गांधीजी को श्रद्धांजलि देने के लिए इससे बेहतर और कोई तरीका नहीं हो सकता था। हां, स्थानीय धार्मिक आयोजनों खासकर मध्यकाल में पर्यावरण को लेकर बड़ा काम करने वाले सन्तों जाम्भोजी और जसनाथजी से जुड़े मेलों में उनके ‘रूँख प्रसाद’ की पहल भी बेहद अनुकरणीय है।


वे पौधारोपण की मुहिम में गांधीजी को बराबर साथ लेकर चलते हैं, साफ है पर्यावरणीय संरक्षण के साथ-साथ इनका जोर Environmental Peace पर भी है। ‘The Asian Age’ लिखता है कि, “His is a call for environmental peace in a time when climate change crisis is engulfing the planet.” गांधीजी के 150वें जयंती वर्ष पर अपने विशेष लेखों में The Asian Age, Deccan Chronicle जैसे अखबारों ने ज्याणीजी को प्रमुखता के साथ जगह दी है।


वैसे तो ज्याणीजी की हरेक पहल एक मिसाल है लेकिन उनका पौधारोपण में थार मरुस्थल की मूल प्रजातियों पर जोर मुझे व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। बकौल ज्याणी, “इंदिरा गांधी नहर के रिसाव (seepage)को रोकने के लिये वन विभाग द्वारा नीलगिरी (Eucalyptus), शीशम (Dalburgia Sisoo), कीकर (Acacia Nilotica), इजरायली बबूल (Acacia Tortolis)जैसी बाहरी प्रजातियों को ठूंस दिया गया, जबकि इनकी जगह खेजड़ी (Prosopis cineraria), जाळ (Salvadora persica Linn), रोहिड़ा (Tecomella Undulata), देसी बेर (Zizyphus Jujuba) आदि का पौधारोपण किया होता तो तस्वीर कुछ और ही होती।”


हम लोग भी बरसात के दिनों में अपनी धरती की मूल प्रजातियों की बजाय बाहरी/विलायती प्रजातियों के पौधारोपण को लेकर आतुर रहते हैं। ये प्रजातियां न सिर्फ हमारी धरती के नैसर्गिक/असली सौंदर्य को खत्म करती हैं बल्कि पानी भी भरपूर मांगती हैं।


खैर, डॉ श्याम सुंदर ज्याणी एक प्रेरणा हैं। आप मजबूती से अपने मिशन में लगे रहिये, शुभकामनाएं। प्रकृति, पर्यावरण, पौधारोपण में रूचि रखने वालों को एक मर्तबा डूंगर कॉलेज बीकानेर में ज्याणीजी के प्रयोग को जरूर देखना चाहिए।


(लेखक की फेसबुक वॉल से साभार )

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