इस किताब में कैंसर से लड़ाई की दास्तान है !

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– रवीश कुमार

इस किताब में डरावना कुछ भी नहीं है। संभावना है जिसके ख़त्म होने की आशंका है। फिर भी कोई जी रही है। उस आशंका पर संभावना लिख रही है। आप एक साँस में पढ़ते चले जाते हैं जैसे वो अपनी साँसों को हिसाब रखने लगी थी ताकि बची हुई साँसों के बराबर ज़िंदगी बची रहे। उन लम्हों में कोई कितना फट पड़ता होगा लेकिन वो बहुत कम लिखती है। वो लिख रही होती है ज़िंदगी और पढ़ा जा रहा होता है मौत। एक पाठक कितना ‘प्रेडिक्टबल’ हो जाता है जबकि लिखने वाली बेहद ‘सरप्राइज़िंग’ है। वो सचमुच किताब नहीं लिख रही होती है और हम किताब समझ कर पढ़े जा रहे होते है। आप ऐसा मत कीजिएगा। मैंने जल्दी ही ऐसा करना छोड़ दिया।

 
लिखने वाली के जीवन की तरह किताब भी जल्द ख़त्म हो जाती है। तब ध्यान में आया कि अनन्या है कौन। किताब के कवर पर कितना जीवन है। केसरिया फूलों के बीच वह साइकिल पर उड़ी जा रही है। पर वो तो उसका स्केच है। भीतर के पन्नों पर उसकी लिखावट मजबूर करती है कि हम उसे देखें। वो है ही नहीं तो दिखती कैसे। हर छोटे चैप्टर के बाद एक स्केच है। सोचता रहा कि अनन्या निराकार ही दुनिया में रही होगी। सारे पन्ने पलटता गया। वो हर चैप्टर में पढ़ने वाले को मौत से दूर ले जा रही थी और किताब उसकी मौत पर पहुँच रही थी। इस किताब में अनन्या कब दिखती है नहीं बताऊँगा। जो पाठक इस किताब को ख़रीदें वो पन्ने पलट कर न देखे कि वह कहाँ है। 


मुझे क्यों लगा कि इस किताब को आज ही पढ़नी चाहिए? पढ़ता चला गया। इतनी पतली सी किताब में कैंसर से लड़ाई की दास्ताँ नहीं है। बची हुई ज़िंदगी में जीवन का हिसाब भी नहीं है। तो फिर क्या है?


बहुत मुश्किल है। एक अच्छी किताब को कई बार यूँ ही छोड़ देना चाहिए। ख़ुश होना चाहिए कि आपके पास है और आपने पढ़ी है। अनन्या से कैंसर जीत गया। उसके जाने के नौ महीने बाद यह किताब आई है। बल्कि वह जाकर लौट आई है। अनन्या मुखर्जी आपका स्वागत है! आपकी किताब मुझे मिल गई है। मैंने पढ़ ली है।


स्पीकिंग टाइगर्स की तमाम किताबों में ये वाक़ई बेहद अच्छी किताब है। यह किताब मेरी अपनी नई चमकती किताबों के साथ आई थी मगर मैं बंडल खोलकर अपनी किताब किनारे रख गया और अनन्या की किताब के साथ किनारे हो गया।

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