“मैं एक कारसेवक था” एक व्यक्ति के बनने की गाथा है !

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(राजाराम भादू)
” मैं एक कार सेवक था ” पुस्तक के नवारुण प्रकाशन से छपने की जब प्रथम सूचना लेखक भंवर मेघवंशी ने दी थी तो यह उल्लेख किया था कि इसकी पाण्डुलिपि किन हाथों से गुजरी और प्रकाशन की कैसी प्रक्रिया के बाद यह सामने आयी। मुझे उन्होंने यह पाण्डुलिपि इस आग्रह के साथ दी कि मैं इस पर लिखित में राय दूं। तभी से ये टिप्पणी हम दोंनों के बीच थी जिसे यहां अविकल रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस वृत्तान्त को पढना एक अलग अनुभव से गुजरना है। यह एक व्यक्ति के बनने की गाथा के साथ उसके परिवेश और समाज की विसंगति और विडम्बनाओं की गहरी पडताल है। हम पाते हैं कि किसी के बड़े बनने में प्रायः संयोगों और कथित बड़े लोगों की मेहरबानियों का योग रहता है। लेकिन इस गाथा का नायक अपने दुधुर्ष आत्मसंघर्ष के जरिये अपनी इयत्ता अर्जित करता है।
इसे मैं आत्मकथा की जगह वृत्तान्त इसलिए भी कह रहा हूं कि यह एक रूढि जैसी बन गयी आत्मकथाओं की परिधि और इकहरेपन का अतिक्रमण करती रचना है। यहाँ नायक की चेतना की निर्मिति का जटिल और सतत् संघर्ष तो है ही, जो अपने में चेतना की गत्यात्मकता और निरन्तर परिष्कृत होती प्रवृत्ति से परिचय कराता है। उसी के साथ बाह्य दुनिया की अनेक परतें हैं जिनमें जाति और सांप्रदायिकता के दुश्चक्रों ने प्रगति के तमाम रूपों को अपनी गुंजलकों में ले लिया है।
एक दलित आत्मकथा होने के बावजूद आप इसे सिर्फ अस्मिता विमर्श के खांचे में ही रखकर नहीं देख सकते। इसमें व्यक्ति की इयत्ता और निजी पहचान के लिए भी यथेष्ट स्पेस है। लेखक स्वयं दलित लेखन की सीमाओं से न केवल भली- भांति अवगत है बल्कि उन्हें इंगित भी करता है। कोई भी आत्मसंघर्ष गहरी आलोचना दृष्टि और वस्तुपरक विश्लेषण के बिना  अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचता। लेखक अपने समानांतर बहती धाराओं और प्रवृत्तियों का क्रिटीक प्रस्तुत करता है।
आप यहाँ एक निश्चित कालखंड में घटित होते समकालीन इतिहास को देखते हैं। इसे जमीनी कोण से देखा गया है, इसलिए उसके क्षैतिजिक छोर और ऊर्ध्व शिखर भिन्न और ज्यादा सच नजर आते हैं। वहाँ प्रतिरोध को लेकर हमारी लुभावनी धारणाओं और छवियों को आघात पहुंचता है। ऐसी स्थिति में आप एक व्यक्ति को अपने भीतर और बाहर से लगातार लड़ते हुए और प्रतिरोध की डगर बनाते हुए देखते हैं। इसी अर्थ में इस वृत्तान्त का मूल चरित्र एक प्रति – नायक है, जो नायकत्व की कई प्रचलित परिभाषाओं को प्रश्नित कर देता है।
आप इस वृत्तान्त को एक उपन्यास जैसा पाते हैं। संभवतः ऐसा इसलिये हो सका है कि खुद की जीवन- यात्रा  और भोगे हुए अनुभव को भी लेखक ने एक दूरी बनाकर देखा है। इसलिए घटनाएं और काल- खंड यहां अपने संदर्भों और निहितार्थों के साथ आते हैं।
समकालीन इतिहास की दशा और दिशा का जन- पक्षीय विश्लेषण कर लेखक अपनी भूमिका चुनता है। एक बार चुनाव करने के बाद वहाँ संशय और विभ्रम के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं है। साथ ही, अपने चयन पर भरोसा और नतीजे की परवाह किए बिना चलने का साहस है। वृत्तान्त की बेबाक और पारदर्शी भाषा के पीछे यही उत्प्रेरक है। जबकि विकासमान चेतना और अन्तर्दृष्टि  ने इसे प्रवाह प्रदान किया है।-

(राजाराम भादूसाहित्यकार एवं आलोचक)

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