पठनीय पुस्तक है -” मैं एक कारसेवक था”

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(डॉ नवीन जोशी )
भंवर मेघवंशी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। पिछले दो दशकों में उन्होंने देश में दलित अस्मिता के लिए रिक्त पड़े आंदोलन को अपनी बेबाक चुनौतियों से पाट दिया है। सामाजिक असमानता के हजारों सालों के भंवर को इस भंवर ने एक हद तक तोड मरोड कर रख डाला है। उनके नाम जहाँ कई इनाम हैं ,जो उन्हें सामाजिक चेतना को समानता के लिए बुलंद करने के लिए दिए गए हैं, उससे उनकी सकारात्मक छवि उनकी आज वैश्विक आंदोलन में उभर रहे नायकों में बन गयी है। 


यह किताब उन्हें इस नायकत्व की ओर ले जाने की गाथा है। उन पर बहुत कुछ अनेक महान लेखकों ने बहुत कुछ लिखा है ,लेकिन यह किताब ” मैं एक कारसेवक था” उनके साथ हुई “भंवर मेघवंशी” निर्माण की प्रक्रिया का इतिहास हमें बताता है।उन्होंने जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हर स्तर को बारीकी से जाना और हम तक उस संघ की हर परत खोल दी। जहाँ उन्हें जिस वजह से संघ प्रिय लगा और जिस वजह से संघ से मोहभंग हुआ वह सब उन्होंने हमें इससे अवगत कराया है। 


यह किताब इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि फासीवाद के बघनखे को जहाँ सारा देश महसूस कर रहा है ,वही संघ जैसे खतरनाक संगठन को बेकनबाब करना हर सामाजिक चेतन मनुष्य का काम है। हमें इस किताब से यह भी सीखने को मिल रहा है संघ से किस तरह से बचा जा सकता है। आप कैसे इन फासीवादी तालिबानी लोगों के चंगुल में फंस जाते हैं यह हर पन्ने में ही, आरम्भ में उन्होंने बहुत शानदार ढंग से किया है। 


हिमांशु पंड्या जी इस पुस्तक की भूमिका में एक बहुत सुंदर मनोवैज्ञानिक जादुई आकर्षण छोडने में कामयाब रह जाते हैं, जहाँ वो पाठक को यह समझा देते हैं कि लेखक के उत्पीड़न के साथ पाठक स्वयं ही न्याय करे -“यदि इस आत्मकथा को पढकर आपको ऐसी सच्चाइयां पता चले जो आप नहीं जानते थे तो आप शर्तिया  सवर्ण हैं “. जो वास्तविक भी है ‘जाके पैर न फटे बिवाई- सो क्या जाने पीर पराई’. सिर्फ दलित अस्मिता को ही पुस्तक नहीं खोजती है बल्कि आज के नवचेतन वैज्ञानिक समाज के लिए आतुर भारत के क्रांतिकारी अंश पुस्तक के माध्यम से इस आंदोलन के पुरोधा मेघवंशी जी ने दिखला दिए हैं।


पुस्तक सभी मानकों को पूरा करती हुई रिपोतार्ज और आत्मकथा की तरह बहुत ही रोचक बन पडी है। आज के भारत में दलित प्राचीन काल के सामंती युग में जीने को मजबूर है यह हकीकत यह पुस्तक हमें हर पेज में दिखाती है। कई जगह समीक्षक के आंखों में आंसू आ गए कई बार संघ के करतूतों पर (मैं) ही बिफर गया कि कोई कितना क्रूर हो सकता है कितना जल्लाद हो सकता है ,जहाँ वह मरने वाले के हाथ से ही उसके लिए कब्र खुदवा रहा है, जबकि खोदने वाला जानता है कि इसमें मरने वाला वही है।


लेखक के ऐतिहासिक बोध में सर्वोच्चता है ,शब्दों का सटीक चयन किया गया है। प्रकाशन की किंचित अनदेखी में दो तीन शब्द गलत छप गए हैं जो बड़ी बात नहीं है। पुस्तक में यदि सम्बंधित घटना के चित्र होते और साथ कुछ साक्ष्य तात्कालिक पत्र व्यवहार से संबंधित हो सकते तो पुस्तक को और शोधगम्य बनाया जा सकता था।

 
बहरहाल पुस्तक सभी पैमानों में अव्वल रही है। इस किताब को हर किसी को पढना चाहिए और दलित आंदोलन के आलोक में जनवाद के लिए लड़ रहे लोगों को जरूर पढना चाहिए और अधिक से अधिक संख्या में वितरित करनी चाहिए। 


आखिर में पुस्तक कैसी बनी है ,लिखी है, क्या है, कैसा है ? इसको बडा पाठक वर्ग पढ कर तय करेगा, लेकिन मेरे अनुसार पुस्तक में लेखक ने अपने संघ से मोहभंग होने की पटकथा को बहुत सुन्दर ढंग से उकेरा है। संघ से पूर्ण  हठधर्मिता, ब्राह्मणवाद और सामंतवाद को लेखक की कलम हर जगह नोच नोच कर बेपर्दा करती नजर आती है जो सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम है।


फासीवाद के इस घनघोर युग में इस असीमित अंधेरे से सड़क से लेकर पुस्तक तक की लड़ाई लड़ने वाले मेघवंशी को योद्धा कहना अतिरेक/अतिश्योक्ति नहीं होगी। लेखक पत्रकार और एक एक्टिविस्ट की जबरदस्त भूमिका में है, जो पुस्तक में दिखलाई पड़ती है। 


किसी सवर्ण के लिए समानता की लड़ाई महज एक भावावेश और पर्सनैलिटी कल्ट के साथ अपने को प्रस्तुत (स्थापित ) करने का माध्यम हो सकता है, लेकिन असली लड़ाई तो जीने की जद्दोजहद, वह भी सम्मान और बराबरी के साथ जीने का हक के लिए मरखपने की अस्मितता की लड़ाई है ,जो मात्र वही लड सकता है ,जिस पर बीती हुई है। वही दृश्य मेघवंशी दिखाने में सफल हुए हैं। उनकी कहानी हजारों लाखों करोड़ों उन लम्पट स्वयंसेवकों को नई राह दिखाएगी जो आज भी अंधेरे में हैं और उनसे ही आग लगवाएगी भी, मनुष्य का मनुष्य के शोषण के अंत करने तक।

 
बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के जीवन के हर पहलू को मेघवंशी अपनी आप बीती में छायांकित करने में बहुत सफल हुए हैं। एक ओर जहाँ उन्होंने जाति के अंत की बात को कई  बार उल्लेखित किया है, वही पेरियार, फुले और बाबा साहेब की महान समतामूलक शिक्षा की ओर भी पाठक को ले चले हैं। जहाँ एक ओर वे स्वयं के संघ के गदले नाले से अपने को बाहर निकाल पाने की कहानी बता रहे हैं, वहीं वे एक अन्य दलित बाबूलाल बैरवा की संघ के गदले जातिवादी तलाब में से निकल शुद्ध अम्बेडकरवादी आंदोलन में शामिल होने का सिंहनाद को भी दर्शाते हैं। 


जाति का हर जगह फैलता जहर और उस पर पूंजीवाद की परत तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था की देन, मनुवादी शातिराना तौर तरीका लेखक ने सहजता पहचान कर पाठकों तक पहुंचाया है। सरकारी महकमे से लेकर तात्कालिक संघी फासीवादी सरकार के मनसूबों को भी लेखक दिखाना नही भूले। उनके साथ हुए दुर्व्यवहार में उन्होंने पांच हजार साल का इतिहास खंगाल कर रख दिया भले तिथि और तथ्य नदारद रहे ,लेकिन उन पर संघ के शोषण की कहानी ने एक एक इतिहास को मानो उकेर कर सामने रख दिया हो। 


लेखक बेख़ौफ़ हो कर संघ को हिन्दू तालिबान कहने में भी नही डरे और निडर हो कर वर्ग संघर्ष का क्रांतिकारी तरीका स्पष्ट रूप से स्वीकारने में भी नही झिझके । एक ओर बाबा साहेब आंबेडकर का सम्मान ,तो वही गांधी जी को भी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उद्वर्धत करने में वे पीछे नहीं रहे। हर काम संविधान के दायरे में रह कर करने की उनकी जद्दोजहद बहुत शानदार और अनुकरणीय है जो पुस्तक का बहुत सकारात्मक पक्ष है। 


पुस्तक पठनीय है ,शानदार तथ्य कहने का ढंग बहुत निराला है, हर परत पर रोचकता दुगनी चौगुनी होती जाती है ,जिस कारण पुस्तक पाठक को बांधे रहने में पूर्ण सफल हुई है। अब कहानी ही मर्मांत आत्मा को चीर देने वाली हो और उस पर इतना सुन्दर लेखन ..किताब के भाव भंगिमा में चार चांद लगा देता है। प्रकाशक और लेखक को कोटि कोटि बधाई और धन्यवाद ऐसी बेजोड़ शोधात्मक पुस्तक हमें सौपने के लिए। पाठकों से भी अनुरोध कि अधिक से अधिक पढ़े और पढाऐं तभी समतामूलक समाज की स्थापना का सपना इस पुस्तक के माध्यम से पूर्ण होगा. यह भी हम सबका एक सपना है, एक बार पुनः भंवर मेघवंशी को शुभकामनाएं….. 

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