आस्था की अंधी दौड़ कहीं नहीं पहुंचायेगी !

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( हिमांशु कुमार )

पूजा करता है वह भक्त बनता है ,पूजा करवाना और भक्त बनाना यह ब्राह्मणवाद का आधार है.ब्राह्मणवाद को समाप्त करने का रास्ता है भक्ति खत्म की जाए पूजा बंद की जाए .

भले ही आप वह भक्ति परशुराम की करें या रविदास की करें ,गांधी की करें या मोदी की करें या अंबेडकर की करें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता .चाहे वह मार्क्स रहे हो चाहे अंबेडकर रहे हो उन्होंने अनुयाई बनने भक्ति करने का विरोध किया उसको नकार दिया .

उन्होंने वैज्ञानिक सोच, तर्कशक्ति का विकास और जागरूक बनने पर जोर दिया 
2 साल पहले मैंने दिल्ली से सहारनपुर तक पैदल यात्रा करी थी,जेल में बंद भीम आर्मी के चंद्रशेखर की रिहाई को लेकर .उस वक्त गांव में मुझे रविदास मंदिर में ठहरने का मौका मिला .

वहां भी सुबह-सुबह जोर से लाउडस्पीकर चलाया गया और भजन बजे की ब्राह्मणों ने जब पानी में पत्थर तैराया तो ब्राह्मणों का पत्थर डूब गया और रविदास का पत्थर तैर गया 
यानी अंधविश्वास की होड़ हो रही है कि कौन ज्यादा अंधविश्वासी है,वैज्ञानिक समझ कहती है पत्थर नहीं तैर सकता ,लेकिन रविदास के भक्त अपने गुरु को महान सिद्ध करने के लिए पत्थर तैराने का झूठा भजन सुबह सुबह बजा रहे हैं.
 
मुझे समझ नहीं आता ऐसा झूठा वैज्ञानिक भजन सुनकर दलितों का कौन सा मानसिक और सामाजिक विकास होगा .मुझे लगता है वह भी अंधविश्वास में पड़े रहेंगे और हमेशा ब्राह्मणवादी पिछड़ेपन का शिकार बने रहेंगे .

मैं मुंबई सामाजिक न्याय की एक बैठक में गया था ,जिसमें अनेकों दलित और ओबीसी समाज के सामाजिक कार्यकर्ता आए थे और वहां इस बात की चिंता व्यक्त की गई थी कि महाराष्ट्र में बहुत जगह अंबेडकर साहब के ताबीज पहनकर लोग घूम रहे हैं .

ताबीज ब्राह्मणवादी अंधविश्वास का प्रतीक है ,आप अंबेडकर का ताबीज पहनकर अंबेडकरवादी नहीं बन जाएंगे,आप ब्राह्मणवादी ही बने रहेंगे .

अभी रविदास मंदिर के तोड़ने के खिलाफ दिल्ली में बहुत बड़ा प्रदर्शन हुआ ,मंदिर के लिए प्रदर्शन होना किसी समाज के संगठित होने या जागरूक होने का लक्षण नहीं है ,भारत में मंदिरों के लिए समाज अपने सारे मुद्दे भूल जाता है.

किसान अपनी बदहाली भूल जाता है नौजवान बेरोजगारी भूल जाता है ,इसी तरीके से दलित भी अपनी सामाजिक बुरी स्थिति भूल जाएंगे और मंदिर निर्माण में लगे रहेंगे. जो भी समुदाय मंदिर अवतार ईश्वर और धर्म के फेर में पड़ा रहेगा वह पिछड़ा असंगठित और बदहाल रहेगा. 

ना मंदिरों से हालत बदलेगी इंसान की न मस्जिद से ना गुरुद्वारे से ना चर्च से अल्लाह ईश्वर गॉड वाहेगुरु किसी की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं ला सकते .दुआ आशीर्वाद किसी समुदाय का कोई भला नहीं कर सकते.

जो लोग धर्म के चक्कर में पढ़ेंगे वह समुदाय पिछड़ जाएंगे और हमेशा लड़ाई झगड़ों में पड़े रहेंगे ,यदि किसी समुदाय को आगे बढ़ना है तो उसे विज्ञान तर्क और बुद्धि के सहारे ही आगे बढ़ना होगा.
 
यदि दलित ओबीसी और बहुजन अपने समुदाय का विकास चाहते हैं तो उन्हें खुद सारे मंदिरों पर ताले जड़ देनी चाहिए या वहां पर पुस्तकालय खोल देने चाहिए और हर तरह की पूजा पाठ जाप अंधविश्वास पर तुरंत रोक लगाने का अभियान चलाना चाहिए.

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