थाईलैंड का ग्रामीण बौद्ध जनजीवन !

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(डॉ.एम.एल .परिहार )
थाईलैंड कभी किसी देश का गुलाम नहीं रहा. इसके आसपास म्यांमार (बर्मा) लाओस, वियतनाम, कंबोडिया फिर आगे जावा, सुमात्रा ,कंबोडिया सभी देश आज भी बुद्ध की करुणामयी वाणी से गुंजायमान है.
थाईलैंड की जनसंख्या साढे छ: करोड़ है. मुद्रा बाट (baht ) कहलाती है .आम व्यक्ति के जीवन में बुद्ध और धम्म खूब रसा बसा हुआ है. महिलायें और पुरूष सभी उद्यम में लगे होते हैं. स्कूल एजुकेशन फ्री है. स्कूल में सभी को पौष्टिक लंच मिलता है, घर से लाने पर रोक है.
गांवों की बसावट बहुत सुंदर ढंग से होती है. जातियों की सड़ांध से भरे भारत के गांवों से बहुत अलग. हर गांव में एक हराभरा बुद्ध विहार होता है जिसमें बुद्ध की गोल्ड प्रतिमा लगी होती है. विहारों का माहौल बहुत शांत व धाम्मिक होता है. कर्मकांड, पाखंड, लूट खसोट कहीं नजर नहीं आती है. अधिकतर घरों में सूरज उगने से पहले ध्यान साधना होती है. लोग दिन भर खूब मेहनत करते नजर आते है. ईमानदारी व वफादारी कूट कूट कर भरी होती हैं.
भोजन का अधिकतर भाग मांसाहार, फल व उबली सब्जियां होता है. समुद्री फूड में मछली से लेकर मगरमच्छ का प्रयोग किया जाता है.एक जगह बिच्छू व टिड्डियां भी फ्राई खाते हुए देखा. लेकिन मुख्यरूप से फिश को खाया जाता है इसके बाद चिकन व उसके बाद पोर्क (सुअर का मांस) भोजन का भाग होता है. चावल का प्रयोग भी होता है लेकिन ब्रेड व फास्ट फूड बहुत कम खाते है यानी सेहतपूर्ण भोजन पर जोर रहता है. शहर से लेकर गांव तक में चाय, पकोड़े, पान , गुटखा, सिगरेट की दुकान नजर नहीं आती है. हर स्थान हरा भरा व साफ सुथरा. हंसते मुस्कुराते शांत ,विनम्र व मदद भाव के लोग जिनके लिए मानवता ही बड़ा धर्म है. यहां आम जीवन में राजनेताओं की दखलअंदाजी बिल्कुल नहीं है. घरों व सार्वजनिक स्थानों पर कहीं भी इनके कोई फोटो नजर नहीं आते हैं.
यह विडंबना है कि समृद्ध, सभ्य ,शांत खुशहाल ऐसे देशों में हम संगठित धर्मों, संप्रदायों, पंथों के जातिवादी व धर्मभीरू लोग ही जाति, धर्म, वर्ग की विकृत मान्यताओं की गंदगी फैलाते हैं. हम वहां जाकर बसकर वहां भी अपने दड़बे व बाड़े बना लेते हैं. धन कमाने व जोड़ने के भ्रष्ट व अमानवीय रास्ते वहां भी बना कर उन्हें भी चपेट में लेकर सुखमय जीवन में जहर घोल देते हैं.
सुखद बात यह है कि देश दुनिया में तर्क विवेक व वैज्ञानिक चेतना का तेजी से प्रसार हो रहा है. धार्मिक रूढियां दम तोड़ती नजर आ रही हैं. ऐसे दौर में संसार के प्रथम वैज्ञानिक बुद्ध की बातें आज ज्यादा प्रासंगिक व व्यवहारिक लग रही हैं. बुद्ध को आज सबसे ज्यादा पढे जाने व अपनाए जा रहे है.
…….भवतु सब्ब मंगलं…….

(डॉ.एम.एल .परिहार )

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