छात्र संघ चुनावों की खुमारी !

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( पवन’अनाम’ )

आजकल छात्रनेताओं की जमात बड़ी तेजी से बढ़ी है। दरअसल यह एक हवा है। यह वृद्धि अनिश्चित है,चिंताजनक भी। जमात बढ़ती रही तो हर महाविद्यालय/विश्विद्यालय में नेताओं की टोली घूमती नज़र आएगी छात्र नहीं,फिर मैं समझता हूँ ये क्रांतिवीर संघर्ष किसके लिए करेंगे?
दरसअल मैं जिस क्षेत्र में रहता हूं वहां की छात्र राजनीति स्तरहीन है।

एकाध उम्मीदवार को छोड़ कर तमाम छात्र संगठनों के स्वयंभू छात्र हितेषियों की बौद्धिकता के आगे दुनिया की प्रांजल संघर्षशील शख्शियतें नतमस्तक हो जाए। विचारधाराओं की ऐसी मट्टी पलित की है कि बस पूछिये मत।कुछ ही लम्हों में वीररस के छंद पढ़ने वाले राष्ट्रप्रेमियों की रक्त उबलती जुबाने सौहार्द के फूल खिलाने लगती है। 


वैचारिकता के लिए सर कटवाने वाले महान बुद्धिजीवीयों की धारा रातो रात उल्टी बहने लगती है और विचार तो आप पूछिये ही मत। कुछ दिनों पहले मुझे एक छद्म छात्र नेता मत की अपील करते हुए मिला। मैंने पूछा “आपकी क्या विचारधारा है? आप चुनाव जीतकर छात्रों को किस प्रकार लाभान्वित करेंगे”?


उन्होंने उत्तर देने के बजाय एक लंबा सा अपरिपक्व भावगत/व्याकरणिक त्रुटियों से भरा हुआ भाषण दे डाला और भाषण के कुछ अंश ये है जो संशोधित हैं-“हम छात्रों के लिए मर सकते है, देश मे मोदी की सरकार है जो भारतमाता की सेवा कर रही है। हम देश के गद्दारों को कभी पनपने नहीं देंगे। हम गांधी जी ,अम्बेडकर और भगत सिंह के सपनो वाला भारत बनाएंगे। जय हिंद जय भारत लाल सलाम इंकलाब जिंदाबाद”…


मैं अनिमेष निहारता रहा उस विरोदात महामनुष्य को। आज अगर भगत सिंह, चेग्वेरा लेलिन, स्टेलिन जिंदा होते तो ऐसे चिंतकों को सुनकर सर पटक-पटक के मर जाते।अब करे भी तो क्या बेचारे चुनाव लड़ना है, छवि बनानी है।


 पढ़ाई को कभी गंभीरता से लिया नहीं व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से अथाह ज्ञान प्राप्त कर अनेक प्रकार की डिग्रीयां जो ले रखी है। ऐसी कुपढी और विवेकहीन नेताओं से क्या छात्रों के भले की उम्मीद की जा सकती है?


दक्षिणपंथ और वामपंथ में फर्क न समझने वाले महान नेतृगणो की रैलियां और हुजूम उन्हें किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं बनाती है। सड़कों, चौराहों पर लगे होर्डिंग उन्हें भीतर तक रोमांचित होने पर मजबूर कर देते हैं। 


बस उन प्रकांड राजनीतिज्ञों से कोई यह न समझाए कि ‘Spot’ का मतलब स्थान/क्षेत्र होता है और ‘Support’ का अर्थ समर्थन होता है। संघर्ष की मीनिंग ठीक से लिखनी भले ही न आये किन्तु छात्रों की अज्ञात समस्याएं इन्हें बखूबी मालूम है। 


खैर। चंद दिनों के उन्माद में डूबे रहिए। किंतु कृपया करके महान चिंतको/दार्शनिकों द्वारा दिए समाजिक ढांचे में तब्दीली के सिद्धांतों का यूँ न मख़ौल उड़ाइए।


हे! विद्वान ज्ञेय मनिषियों कम से कम विचारधाराओं को बख्श दीजिए। 


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