‘भोजन के अधिकार अभियान ‘ का सातवां अधिवेशन छतीसगढ़ में शुरू !

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(20 सितम्बर 2019,रायपुर-छतीसगढ़)
रोजी रोटी अधिकार अभियान का भोजन एवं काम के अधिकार पर 7th राष्ट्रीय अधिवेशन
रायपुर,छत्तीसगढ़ में शुरू हुआ । तीन दिवसीय इस अधिवेशन के पहले दिन के सत्र में हक़ के लिए संघर्ष, लोकतंत्र पर हमला,कल्याणकारी राज्य पर हमला,संस्थानों पर हमला,गहन लोकतंत्र और गांधी के 150 साल आदि विषयों पर चर्चा हुई । इस सत्र की शुरुआत छत्तीसगढ़ के साथी गंगाभाई द्वारा स्वागत के साथ हुई । गंगाभाई ने कहा कि इस तरह के अधिवेशनों से जमीन पर काम करने वाले लोगों को संबल मिलता है । अभी जहां देश में विकास के नाम पर संसाधनों की लूट की जा रही है और केवल हिंदुत्व के नाम की राजनीति की जा रही है इसलिए ऐसे अधिवेशनों का होना बहुत जरूरी है ।
राइट टू फ़ूड अभियान की संस्थापक सदस्य कविता श्रीवास्तव ने इस अभियान की शुरुआत कैसे हुई, उसकी जानकारी दी । उन्होंने बताया की 2001 में राजस्थान और 14 अन्य राज्यों में भूख से कईं मौते जब हो रही थी ,तब न तो केंद्र और न ही राज्य सरकार इसकी जिमेदारी ले
रही थी तब ज्यां द्रेज, निखिल डे और हम जैसे लोग सुप्रीम कोर्ट पँहुचे तो कोर्ट ने उसका
स्वागत किया और कहा कि इसको अब छुट्टियों के बाद देखेंगे और इसके बाद हम जब वापस न्यायालय गए तब हमारे साथ के अर्थशास्त्री ने बताया कि सरकारी गौदामों में इतना अनाज
भरा है कि अगर अनाज की बोरियों को नीचे से जमाना शुरू करे तो चाँद तक पंहुच जाए, इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने समझा और सरकार को आदेश दिया और इसके साथ ही राशन,पेंशन,आंगनवाड़ी बच्चों,धात्री गर्भवती महिलाओं के मध्यान्ह भोजन ये सब अधिकार हो गए और
लगातार 16 साल कोर्ट ने इस केस को मोनिटर किया और 100 से अधिक आदेश जारी किये । लेकिन आज देश मे न्यायपालिका की हालत गंभीर है । सरकार किसी की नही सुन रही है और जबरदस्त हमला हमारे अधिकारों पर कर रही है । लेकिन हम नफरत की राजनीति के साथ
नही हो सकते,हम ब्राह्मणवादी व्यवस्था के साथ नही खड़े हो सकते है । हम हमारे संविधान को कायम रखने के लिए लड़ेंगे ।
महाराष्ट्र से आई साथी उल्का महाजन ने कहा कि ” इस सम्मेलन में मंच से लेकर सामने महिलाएं ज्यादा संख्या में दिख रही है,इस बात की बहुत खुशी है । उन्होंने अमित शाह के भाषण का जिक्र करते हुए कहा कि देश के गृह मंत्री एक देश, एक भाषा की बात करते है, हमें इसका विरोध करना चाहिए क्यों कि हमारे देश में भाषा की विविधता है ,संस्कृतियां अलग है इसलिए कोई भाषा एक होगी तो केवल प्रेम की हो सकती है । हमारा देश डॉ आंबेडकर के संविधान से चलना चाहिए लेकिन वर्तमान में ऐसा हो नही रहा है । सरकार को चुनौती देना हमारा बुनियादी अधिकार है , सरकार बच्चों को भूखा मारकर बुलेट ट्रेन की बात करती है,इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की बात करती है ।सरकार लोगों में डर बनाये रखना चाहती है क्यों कि डर से भ्रम पैदा होता है और सरकार यही चाहती है,पूंजीपतियों की कठपुतली है । हमें निजीकरण के खिलाफ लड़ना होगा ।
बस्तर से आई साथी इंदू नेताम ने कहा कि हमारे देश के लिए कहा जाता है ये स्वर्ग से सुंदर है,
हजारों देवी-देवता है लेकिन फिर भी सम्मान,रोटी,कपड़ा जैसी मूलभूत सुविधाएं नही है फिर कैसे ये देश महान हुआ । हमको भय दिखाकर हमारे संसाधन लुटे जा रहे हैं, जमीन छीनने का काम किया जा रहा है । हमें इन सबके खिलाफ लड़ना होगा ।
छत्तीसगढ़ की साथी दीपिका ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि दंतेवाड़ा में एक 17 साल की लड़की का crpf के जवान द्वारा बलात्कार किया जाता है,लेकिन पुलिस द्वारा न fir होती है ना लड़की को किसी प्रकार से सहायता मिलती है उल्टा लड़की पर दबाव बनाया जाता है कि वो ये बयान दे कि बलात्कार हुआ ही नही । ये केवल एक केस ही नही है ,2015 में ऐसे 60 से 70 मामले दर्ज हुए थे ।
Ncpri की सयोजक अंजलि भारद्वाज ने कहा कि पूरे देश को गैर संवैधानिक ताकतों ने जकड़ रखा है ।केवल 9 परिवारों के पास देश के 50% लोगों जितना धन है,पूंजीपतियों का बोलबाला है ।इस सरकार ने 3 चीजों पर प्रहार किए हैं जिसमे पहला सूचना के अधिकार पर हमला, दूसरा भ्र्ष्टाचार निरोधक कानून को कमजोर करना और तीसरा सवाल उठाने वालों पर प्रहार करना ।जो सवाल पूछ रहा है उसको देशद्रोही, अरबन नक्सल ,माओवादी साबित किया जा रहा है । इससरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं का मज़ाक बना दिया है ।
दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने कहा की हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां इंसान कैद किये जा रहे हैं और तितलियां आज़ाद की जा रही है ।चौपाये जानवर बचाये जा रहे हैं और उनके नाम पर इंसान मारे जा रहे हैं,संविधान पर माथा टेक कर अगले ही पल संविधान की
हत्या करने का दौर इस देश में चल रहा है । डॉ. आंबेडकर का गुणगान करते है और अम्बेडकर की किताबें छापना बन्द कर देते हैं । आज जो बात की जा रही है एक भाषा,एक दल,एक देश
सब कुछ वो एक कर लेना चाहते है लेकिन जहाँ हम इतनी विविधता वाला देश है, कैसे हम इस थोपी एकरूपता के साथ जियेंगे । रोजी रोटी अधिकार अभियान को अपने भीतर में जगह उन समूहों को भी देनी चाहिए जिन समूहों के अपने सवाल है । दलितों के खूब सवाल है जिन पर भी बात हो । मिड डे मील की अगर बात हो तो उनमें भेदभाव होता है,अलग बर्तन रखे जाते है उस पर भी ध्यान देने की जरूरत है । सरकारी छात्रावासों में खाना पोषण युक्त नही होता है,समय पर नही मिलता है इन सवालों पर भी काम और बात हो। भोजन जमीन से भी जुड़ा है जब
दलितों के पास भूमि के अधिकार नही होंगे तो भोजन कैसे मिलेगा इसलिए इनके भूमि
अधिकार पर भी बात हो ।
दिल्ली से आये पत्रकार सोपान जोशी ने ‘महात्मा गांधी के 150 साल’ पर बोलते हुए गांधीजी के जीवन पर प्रकाश डाला । उन्होंने कहा हम गांधी को देखकर बड़े हुए हैं,देश में उनकी ढेरों मूर्तियां हैं,संस्थान है लेकिन आज हम गांधी जैसे जीवन की कल्पना नही कर सकते, हमें नई चीजें बाद में समझ आती है जैसे उस वक़्त गांधीजी के काम शुरुआत में नेहरू और सरदार पटेल को
समझ नही आये लेकिन थोड़ा देर से समझ पाए । मोहनदास जो अपने विद्यार्थी जीवन
में बहुत शर्मीले थे,वकालत पढ़ने के बाद जब कोर्ट पँहुचे तो वहां भी ठीक से पैरवी नही कर पाए । बाद में दक्षिण अफ्रीका पंहुचकर वहां कईं बड़े काम किये ।उन्होंने ये संमझ लिया था कि बड़े आंदोलन महिलाओं के बिना सफल नही हो सकते इसलिए उन्होंने महिलाओं को आंदोलनों में शामिल किया। आज़ादी की लड़ाई में कईं महिलाओं ने अपने प्राणों की आहुतियां दी । देश में
जब खादी का चलन बढ़ा, उसके पीछे महिलाओं का ही हाथ रहा क्यों कि गांधी जी महिलाओं को खादी के काम मे आगे लेके आये, उससे धीरे-धीरे जो पैसा इंग्लैंड की कपड़ा मिलों को जा रहा था वो महिलाओं को मिलने लगा । गांधी जी ने एक बात समझ ली थी कि धर्म,लिंग,भाषा,नस्ल,जाति ही अपने पराये में बांटती है । इसलिए उन्होंने अंत तक भाईचारे,भेदभाव मुक्त समाज
और अहिंसा का ही संदेश दिया ।
कार्यक्रम के अंत में सचिन द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 पर लिखी किताब का विमोचन भी किया गया ।

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