संघी ‘भंवर’ से निकालते ‘मेघवंशी’ !

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(सम्राट बौद्ध )
बड़े गर्व के साथ कहूंगा कि मैं ‘मैं एक कारसेवक था’ किताब का पहला पाठक हूँ। इस जीवनी का पूरा सार इसके शीर्षक के आखरी शब्द ‘था’ में निहित है और यही वो शब्द था जिसके कारण मैं किताब का इंतज़ार कर रहा था।
संघ के बारे में दलित पिछडो में कई तरह की धारणाएं बनी हुई है और मैं उन में से अधिकांश पर इसलिए भरोसा नही करता क्योंकि वे किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा कही और फैलाई गई है जो संघ का हमेशा विरोधी रहा है । ऐसे में मेरे मन मे हमेशा से संघ को उसके भीतर के आदमी से जानने और समझने की इच्छा रही है , जो संघ का सही मूल्यांकन कर सके और यही काम जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी की जीवनी ‘मैं एक कारसेवक था’ पूरा करती है।
किताब अपने सबसे रोचक हिस्से से प्रारम्भ होती है, जब भंवर मेघवंशी जो एक कट्टर संघ भक्त है , वह भारत मे गुलामी के प्रतीक (संघ के अनुसार) बाबरी मस्ज़िद को गिराने के लिए मरने को भी तैयार है। किताब अपने पहले ही पन्ने से आपको जकड़ लेती है, ट्रैन में जब भंवर मेघवंशी अपने तमाम साथी कारसेवकों के साथ अयोध्या जा रहे थे ,  तब क्या उनके दिमाग मे क्या था , वो क्या सोच रहे रहे, उस ट्रैन का माहौल कैसा था, उनके साथ अन्य लोगों का व्यवहार कैसा था, वे खुद को कैसे देख रहे थे ? जैसे तमाम सवालों का विवरण बहुत ही सरल भाषा मे लेखक ने किया है । पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे मैं स्वयं ट्रैन के उस डिब्बे में बैठा हूँ और यह सब देख रहा हूँ।
 आप उस कारसेवक की मन की बातें पढ़ कर बड़ी आसानी से यह समझ सकते हैं कि आज जो लोग मोब लिंचिंग करते हैं ,उसके मनोभाव क्या रहते होंगे। पर यहीं मुझे लेखक से शिकायत है जिस तरह लेखक उस समय और कारसेवक की सोच का वर्णन करते हैं उसे और आगे पढ़ने का मन था, मैं उस पूरे माहौल को 2-4 पृष्ठों में नही बल्कि 40-50 पन्नों में पढ़ना चाहता था। मतलब यह है कि इस अध्याय को विस्तृत किया जाना चाहिए।
इस किताब की दूसरी सबसे खूबसूरत बात है लेखक की ईमानदारी। आपको किताब में बाद में पता चलेगा कि कैसे संघ और लेखक के मध्य विवाद और कई बार तो हिंसा की हद तक का टकराव होता है। तब भी किताब के प्रारम्भिक अध्यायों में लेखक उन तमाम कटु अनुभवों के बाद भी संघ की शाखाओं,प्रार्थना और संघ की विचारधारा का बड़ी ईमानदारी से बिना किसी पूर्वधारणा के उल्लेख करता है। आप इन अध्यायों को पढ़ कर यह समझ पाएंगे कि संघ का एक पक्का कार्यकर्ता कैसे सोचता है ? वह बाकी दुनिया को कैसे समझता है? अल्पसंख्यकों को कैसे देखता है व  उनके प्रति कितनी नफरत रखता है ? यह विवरण आज अल्पसंख्यकों के साथ हो रही हिंसा और उनके खिलाफ दिए जा रहे जहरीले बयानों के पीछे की पृष्ठभूमि को समझने में मदद करता है ।
 यही ईमानदारी और संघ के प्रति समर्पण पाठको का ध्यान किताब के शीर्षक में लिखे उस एक शब्द ‘था’ पर फिर ले जाता है कि कैसे इतना समर्पित संघ का कार्यकर्ता संघ के खिलाफ संघर्ष करने में अपना जीवन लगा देता है। यहीं से कहानी मोड़ लेती है।
सम्पूर्ण कहानी के केंद्र में है संघ पदाधिकारियों द्वारा अपने ही एक निष्ठावान दलित स्वयंसेवक के घर खाना न खाने की घटना। यूं तो यह सदियों से इस देश मे होता आया है ,पर हिन्दू धर्म को जोड़ने, सामाजिक एकता स्थापित करने जैसे संघ के कोरे सिद्धान्तों का असली सच जब भंवर मेघवंशी जैसे समर्पित कार्यकर्ता को पता चलता है ,तब वह संघ के शीर्ष स्तर तक इसकी शिकायत करता है पर उस पर कार्यवाही न होने से  आत्महत्या तक के लिए उतारू हो जाता हैं। 
अपने उस समय के मनोभाव को लेखक जिस अंदाज से लिखते हैं वह किसी भी पाठक को भावुक कर सकता है। यहां मैं ज्यादा नही लिख कर आप सभी से कहूंगा कि यही हिस्सा पढ़ने के लिए आप किताब खरीदें और एक कुएं के मेंढक संकीर्ण अंध भक्त के ज्ञान के अथाह सागर तक पहुँचने के सफर को समझने की कोशिश करें ।किताब के शीर्षक में समाहित उस ‘था’ शब्द की कहानी आगे बढ़ती है। जो तमाम वंचित वर्ग के लोगों को संघी ‘भंवर’ से बाहर निकलने के लिए किया गया संघर्ष दिखाती है।
अंत के अध्यायों में भंवर मेघवंशी द्वारा किये तमाम जन आंदोलन वर्णित है।  इन आंदोलनों और इनकी क्रियाविधि को आज के तमाम उत्साही दलित युवाओं को जरूर पढ़ना चाहिए,खासतौर पर जो ‘जय श्री राम’ की तर्ज पर ‘जय जय जय जय भीम’ का नारा लगाते हैं, अपने गांव के आगे ‘द ग्रेट चमार’ लिखने को अम्बेडकरवाद समझते हैं और हिंसा ,उपद्रव व तोड़फोड़ के ज़रिए अधिकार प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं कि हिंसक रास्तों से बदलाव नहीं आएगा,इसके लिए संवैधानिक रास्ते ही उपयोगी होंगे।
इस जीवनी का आखरी भाग अम्बेडकरवाद का नाम पर लड़ते तमाम लोगों के लिए सीख है । संघ अपने विरोधी को भी जीतने का हर सम्भव प्रयास करता है और इसी ‘भंवर’ में तमाम लोग फस जाते हैं ,पर लेखक किस तरह संघ के उन षडयंत्रो से बच कर बिना व्यक्तिगत लाभ की आशा में समाज के लिए खुद को समर्पित करता है , यह पढ़ने और अनुसरण योग्य बात है।
मैं यह कह सकता हूँ कि भंवर मेघवंशी की यह जीवनी मदद करती है हिन्दू एकता और हिन्दू राष्ट्र के भंवर को समझने और उससे निकलने में, यह जीवनी संघ की विचारधारा के असली भंवर को भी उजागर कर देती है। अंत मे इसके लेखक व प्रकाशक को बधाई,पर विशेष तौर पर बधाई के पात्र नवारुण प्रकाशन के संजय जोशी हैं, जो आज 2019 के भारत में,जबकि प्रधानमंत्री को पत्र लिखने मात्र से मुकदमे दर्ज हो रहे है, इतने बड़े सच को उजागर करने वाले दस्तावेज को प्रकाशित करने की हिम्मत रखते हैं। जबकि वे इसके परिणाम से भी अच्छे से वाकिफ होंगे।
यह जीवनी वंचित वर्ग के हर उस युवा को पढ़नी चाहिए ,जो अभी भी अखंड हिन्दू राष्ट्र का सपना देख रहे हैं , ताकि कल तो उन्हें ये ना कहना पड़े कि ‘मैं कारसेवक था’ । वो समय रहते सचेत हो सकते हैं,यह पुस्तक पाठक को न केवल संघी संजाल की अधिकृत जानकारी मुहैया करवाती है,बल्कि उस भंवर से बाहर निकालने का रास्ता भी प्रदान करती है, मैं लेखक और प्रकाशक को ढेरों शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ।
सम्राट बौद्ध (लेखक का हाल ही में प्रकाशित जीवनी शैली का उपन्यास ‘उदुम्बरा’ काफी चर्चित हुआ है)

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