एक शिक्षक की शिक्षा मंत्री के नाम खुली चिटठी !

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आदरणीय शिक्षा मंत्री जी,
सादर नमस्कार !


आशा करता हूं कि आप स्वस्थ और प्रसन्न होंगे । हां, मैं स्वस्थ तो हूं पर प्रसन्न नहीं । शायद आप मेरी अप्रसन्नता का कारण जानना चाहेंगें । बात दर असल ये है कि अनेक विपरीत पारिवारिक-सामाजिक परिस्थितियों के बाद मैं 2012 में अंग्रेजी वरिष्ठ अध्यापक बना । गांव से 9 किमी दूर पॉस्टिंग हुई । चूंकि मेरी विद्यालयी शिक्षा सरकारी स्कूल्स में ही हुई थी और मैं बेहत्तर ढंग से जानता था इस तंत्र की मजबूती को, कमजोरियों को भी । लिहाज़ा मैं पहले दिन से ही अथक मेहनत करता रहा ।

प्राइवेट स्कूल्स द्वारा शिक्षा को ‘प्रॉडक्ट’ बनाकर बेचने का बिजनेस मुझे कचोटता था । शायद यही कारण था कि न तो मैंने कभी संडे को एक्सट्रा क्लासेज लेने में आलस्य किया और न ही बीच बरसात स्कूल जाने में । कई दफा तो बुखार में भी रेस्ट की बजाय पढ़ाने को प्राथमिकता दी मैंनै । और मैं ही नहीं, मेरे साथ नवचयनित मेरे दोस्त भी स्कूल से लौटकर घंटों फोन पर चर्चा किया करते कि कमजोर बच्चों की रीडिंग स्किल को कैसै बेहत्तर बनायें ? पढ़ाने के लिए ट्रांसलेशन मैथ्ड बैटर है कि डायरैक्ट ? ग्रैमर और वोकैब इम्प्रूव कैसै हो ? हम सबकी एक ही जिद थी- “लोगों के मस्तिष्क से इस वहम को निकालना कि सरकारी की बजाय प्राइवेट स्कूल अच्छे होते हैं ।”


वक्त बीतता गया । फिर इंग्लिश स्कूल लैक्चरर में चयनोपरान्त मेरा पदस्थापन पश्चिमी राजस्थान के किसी गांव में हो गया । मेरे गृह जिले गंगानगर के मुकाबले यहां परिस्थितियां और भी खराब थी । निम्न  शैक्षणिक स्तर, जातिय भेदभाव, छूआछूत के साथ-साथ परीक्षा केंद्रों पर सामूहिक नकल जैसी समस्याओं से भी यहां एक ईमानदार  स्थानीय शिक्षक की संगति में जूझते हुए अपना सर्वोत्तम करने का प्रयास किया । इसी दौरान शादी भी हो चुकी थी और एक बेटी भी । जीवनसंगिनी गृह जिले में गांव से पैंतीस किमी दूर एक स्कूल में कार्यरत है और मैं ठेठ मारवाड़ में । आप ऊब रहे होंगे कि मैं ये सब आपको क्यों बता रहा हूं ।


इसीलिए, मूल बात पर आता हूं । हमारी बेटी अभी साढ़े तीन साल की है और मेरी अप्रसन्नता का कारण बेटी ( और लाखों छोटे बच्चों) के एडमिशन से ही जुड़ा हुआ है । हमारे सामने इस वक्त दो विकल्प हैं- किसी अच्छे से प्राइवेट/कॉन्वेंट स्कूल में बेटी का एडमिशन नर्सरी/एलकेजी-यूकेजी में करवा दें अथवा बेटी को दो साल पड़ौस के आंगनबाड़ी केंद्र में भेजकर छः साल की होने पर गांव के सरकारी स्कूल में पहली कक्षा में एडमिशन करवायें । इस असंमजस में दो महिने बीत चुके । पहला विकल्प दोस्तों के ढेरों तर्कों/समझाने के बाद भी गले नहीं उतर रहा । यदि ऐसा करुं, तो खुद की नज़रों में ही दोगला साबित होऊंगा ।

नव शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में जब  हम प्रवेशोत्सव के दौरान  घर-घर सरकारी  विद्यालयों की खूबियां बताते हुए सम्पर्क के लिए जाते हैं, तो प्राइवेट स्कूल संचालकों के मैंटली हाइजैक्ड कुछ पैरेंट्स हमसे सवाल करते हैं- “आपके खुद के बच्चें किस स्कूल में पढ़ते हैं ?” स्वयं को कुछ ज्यादा ही  समझदार मानने वाले तो  यहां तक कह जाते हैं कि “सरकारी नौकरी करने वालों, राजनेताओं और अमीरों के नहीं, गरीबों के बच्चें पढ़ते हैं सरकारी स्कूल्स में ।” 


फिर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में, जहां सरकारों का प्राथमिक दायित्व सभी लोगों का प्रतिनिधित्व रखते हुए सरकारी मशीनरी के माध्यम से जनता की सेवा करना होता है, वहां यदि हम सब मिलकर निजी संस्थाओं/कंपनियों को ही प्रोत्साहन और सहयोग देने लगेंगे, तो जनता का खून चूसने वाले पूंजीवादी ढांचे और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाले भारत में क्या फर्क रह जायेगा । गत कुछ वर्षों में जिस ढंग से शिक्षा, चिकित्सा,रेल-बस-एयर जैसै परिवहन साधनों, पर्यटन आदि का तीव्र गति से नवीनीकरण हुआ है, उस हिसाब से तो लगता है कि आने वाले कुछ वर्षों में तो सरकारी स्कूल भी अपनी अंतिम घड़ियां गिन रहे होंगे । कुछ भी हो, देश की 90% संपत्ति पर कब्जा जमाये बैठै 10% एलीट लोगों की जेबें भरने की कृतघ्नता में मेरे जैसा अल्ट्रा सेंसिटिव इंडियन सिटिजन तो शरीक नहीं हो सकता । और फिर उन बेरोजगारों का क्या होगा, जो हर साल बीएसटीसी/बीएड कर रहे हैं ?


नौकरी के पहले दिन से ही Teaching is not a profession but it’s a passion मानकर काम करने वाला मेरे जैसा शिक्षक आज असमंजस में है । अधिकांश दोस्तों के बच्चें इंग्लिश मीडियम प्राइवेट स्कूल्स में जा रहे हैं । और हम ? हम अपनी बेटी को आंगनबाड़ी केंद्र भेज रहे हैं, क्योंकि सरकारी स्कूल की पहली कक्षा में एडमिशन के लिए निर्धारित आयु की अभी वह हुई नहीं है। बेटी पहले जीवनसंगिनी की जिस स्कूल में पॉस्टिंग है, उस गांव में  संचालित केंद्र पर और अब हमारे ही गांव में स्थित केंद्र पर जाती रही है, लेकिन दोनों ही केंद्रों की स्थिति खेदजनक और अपर्याप्त सी है । दसवीं-बारहवीं तक पढ़ी एक ठेठ देहाती औरत, जिसे न चाइल्ड साइकोलॉजी का ककहरा पता है और न LSRW की अवधारणा, न उसने टीचिंग का कोई कोर्स किया है और न ही कंट्रोल्ड कंडीशन्स में टीचिंग प्रैक्टिस,  वह  बेटी को क्या सिखा पायेगी, कितना सिखा पायेगी ? फिर उनके पास गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण,प्रसव, पोषाहार जैसै अन्य कार्य भी हैं । मेरी बेटी के मम्मी-पापा तो खुद टीचर्स है, वे उसे यथासंभव पढा़-सिखा लेते होंगे, लेकिन पूरे राज्य में ऐसी कितनी मासूम बेटियां, कितने मासूम बेटे होंगे, जिनके माता-पिता निरक्षर हैं अथवा अपने कार्य की प्रकृति की वजह से बच्चों को वक्त ही नहीं दे पाते ।

आप भी इस बात को बेहतर जानते होंगे कि कमजोर नींव की बुनियाद पर एक मजबूत और बेहत्तरीन इमारत का निर्माण नहीं किया जा सकता । क्या हम सब मिलकर इन आंगनबाड़ी केंद्रों से  प्राइवेट स्कूल्स/कॉन्वेंट मॉडल से कम्पीट कर पायेंगे ? या फिर छः  साल की उम्र में सरकारी स्कूल की पहली कक्षा में प्रवेश लेकर वे प्राइवेट स्कूल के पहली कक्षा के बराबर लेवल तक जा पायेंगे ? क्या हमारे बच्चे उतने ही आत्मविश्वास के साथ स्पीकिंग/रीडिंग/राइटिंग/पैंटिंग/डांस/सिंगिंग/एक्टिंग एरिया में परफॉर्म कर पायेंगे, जितने प्राइवेट स्कूल्स के बच्चें करते हुए देखे जाते हैं ।

मैं हर साल आठवीं पास कर आये ऐसे विद्यार्थियों से रूबरू होता हूं, जिन्हें न अंग्रेजी की पुस्तक पढनी आती है, न बेसिक सी बातें । यहां तक कि कुछेक तो खुद का नाम/स्कूल का नाम भी नहीं लिख पाते इंग्लिश में । ये सब देखकर मन आहत होता है । चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहा, क्योंकि मैं तो सीनियर कक्षाओं में पढ़ा रहा हूं  । बेटी का प्राइवेट स्कूल में एडमिशन नहीं करवाने पर कुछ लोग मुझे कंजूस बता रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि आप छठी क्लास में ABCD सीखकर भी इंग्लिश लैक्चरर बन गये, वो जमाना और था, अब वो बातें मत सोचो ।

 
खैर, महाकारुणिक बुद्ध को पढ़कर मैं अनावश्यक बातों की उपेक्षा करना तो सीख गया हूं और मुझे उनकी कोई परवाह नहीं । पर मुझे परवाह मेरी बेटी जैसै राज्य के लाखों मासूम बच्चों की तो है । उनके भविष्य की तो है । सरकारी स्कूल्स में अध्ययनरत/भविष्य में प्रवेश पाने वाले बच्चों के शैक्षणिक स्तर की तो है । या फिर राजकीय  शिक्षक पाठ्यक्रम पूरा करवाकर/रिजल्ट 60-70% रखकर इतराते रहेंगे कि हमें विभागीय नोटिस तो नहीं मिला ।  राज्य में लाखों बी एड धारी बेरोजगार बैठै हैं, क्या वे आंगनबाड़ी केंद्रों में सार्थक भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं ? अथवा हम गवर्नमेंट प्रायमरी, अपर प्रायमरी, सैकंडरी और सीनियर सेकंडरी की तरह “प्री प्रायमरी” का ढांचा भी विकसित कर सके हैं ? और भी बहुत से विकल्प तलाशे जा सकते हैं ।


यद्यपि आपसे कभी मिला नहीं हूं, लेकिन आपकी स्पष्टवादिता, जीवटता, नवाचारी मानसिकता और प्रगतिशील सुधारात्मक प्रवृत्ति मुझे आश्वस्त करती है कि आप इस दिशा में वांछित क़दम उठाने से हिचकिचायेंगें नहीं । हां, मैं तो इतना वादा कर सकता हूं कि न केवल मैं, बल्कि मेरे जैसै हज़ारों नवचयनित ऊर्जावान शिक्षक-शिक्षिकाएं आपके हर एक नवाचारी-रचनात्मक आदेश को पूर्ण उत्साह के साथ धरातल पर लागू करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं । मैं तो व्यक्तिगत रूप से यह चाहता हूं कि हमारा राज्य शिक्षा के मामले में केरल से भी बेहत्तर हो और आपको पूरा देश एक आदर्श शिक्षा मंत्री के रूप में सदैव याद रखे । 


आपकी सकारात्मक पहल के इंतजार में,

एक शिक्षक
( बी एल पारस )

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