नर्मदा घाटी के प्रतिनिधि मेधा पाटकर के साथ उपवास पर!

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नर्मदा याने सुख देने वाली सुखदायी, …………. आज जब कि उसके ही जल संसाधन से खिलवाड़ करने पर जल संकट के छाये में धकेली गयी है, नर्मदा घाटी के हजारों परिवार, तब अहिंसक लेकिन कठोर सत्याग्रह के सिवाय कौन सा अस्त्र हाथ में ले घाटी के बहन भाई? 34 सालों से संघर्ष और निर्माण में लगे रहे नर्मदा आंदोलनकारी अब फिर बड़वानी जिले के छोटा बड़दा में शुरू करेंगे उपवास! प्रतिनिधि दल के रूप में डटेंगे किसान, आदिवासी, महिला प्रतिनिधि भी! मेधा पाटकर साथ में रहेगी।

सरदार सरोवर का जल स्तर 133 मीटर के उपर बढ़ने लगने से, सच तो 130 मीटर के आगे से ही अब गांव गांव का टूटना, खेत-घर-मुहल्लों का टापू बनना, गांव में आज भी खड़े पेड़ और मंदिर, भवन हो या दुकान… सब का पानी से घेरा जाना धीमा जहर पिलाने जैसी स्थिति सामने ला रहा है। पुनर्वास के लाभ, कोर्ट के या प्राधिकरणों के हो, आदेशों का भी उल्लंघन होते हुए देना आज भी बाकी है।

बचे हुए है सैंकड़ो किसान, जिन्हें जमीन की पात्रता होते हुए जमीन या 60 लाख भी मिलना बाकी है। दुकानदारों का पुनर्वास कहां हुआ है? धार तहसील में जमीन दी तो कब्जा नहीं, खलघाट में जमीन दी तो घरप्लाट नहीं! मात्र 50 परिवारेां को भी नहीं दे पायी खेत जमीन, भूतपूर्व म.प्र. की शासन ‘0’ बैंलन्स बता बताकर सर्वोच्च अदालत को भी धोखा दिया और अधिकारी-दलालों के भ्रष्टाचार में विस्थापितों को भी फंसाया। कुम्हार, केवट,मछुआरे हो या मजदूर, उन्हें भी जो पट्टे, अधिकार या अनुदान से वंचित हैं, संघर्ष के द्वारा ही आदेश प्राप्त हुए फिर भी, पुनर्वसित नहीं मान सकते। और तो और, पुनर्वास स्थलों पर पीने का पानी हो या निकास की व्यवस्था, चारागाह या स्मशान… इन बुनियादी सुविधाओं के अभाव में 2017 तक के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी पालन हुआ नहीं है, यह स्पष्ट है।

म.प्र. के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात में और अलिराजपुर म.प्र. के पहाड़ी गांवों में भी तो सैकड़ों आदिवासीयों को जमीन या घरप्लाट नहीं तो वे भी सत्याग्रही का रूप लेकर डटे हैं। 2017 में  जितने घर जबरन तोड़े गये, ऐसे भिताड़ा, झंडाना, रोलीगांव, कुकडिया जैसे गांवों के परिवारों को अभी तक बाकी है, मकान बांधने के लिए भूखण्ड एवं सुविधाओं के साथ पुनर्वास स्थल प्राप्त होना भी!

म.प्र. की आज की सरकार संवाद करते हुए आगे बढ़ रही है लेकिन गांव गांव के बचे हुए कार्य की निश्चिती और संख्या भी तय करना बाकी होते हुए,गुजराज और केन्द्र हठाग्रह पर है। 138.68 मीटर तक पानी का स्तर बढ़ाने पर आमादा है ये विकासखोर! विश्व बैंक का 1993 का निष्कर्ष कि यह बांध केवल असमर्थनीय हथकंडे अपनाने पर ही पूरा हो सकता है, आज सही साबित हुआ है।

आज भी म.प्र. शासन ने उपर के बांधों के गेटस न खोलते, और चारो राज्यों की परियोजना के (सरदार सरोवर के) गेट्स खुले रखते हुए बड़वानी, धार,खरगोन, अलिराजपुर के गांवों को जल समाधि नहीं दी जाए, यह देखना जरूरी हैं। यह कोई उपकार नहीं, संवैधानिक अधिकार है, जीने का जीविका का।

यह आज संभव भी है कि गुजरात के 204 बांधों के जलाशय, करीबन सभी जब लबालब भरे हुए है, तब एक साल गुजरात नर्मदा के पानी का हठाग्रह न रखे। म.प्र. को वैसे भी बिजली की जरूरत नहीं है। 21000 मेगावाट की विद्युत निर्माण की क्षमता होकर आज के रोज मांग मात्र 7000 मेगावाट में पूरी हो रही है। तो मानवीय और संवैधानिक दृष्टी से भी क्यों नहीं रूक सकते है, साल भर के लिए?

गांव के नीचले फलियों को डूबाकर अब उपर बढ़ता पानी हाःहाकार मचा सकता है। म.प्र. की राजनीति नहीं, अधिकार नीति सशक्त रूप से इसे चुनौती देगी और नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण जो नहीं सक्षम है, न हि निष्पक्ष है, उसे कानूनी दायरे में ही जल स्तर बढने न देने की बात मनवाकर रहेंगे,तभी बचेगे लोग और उनके अधिकार!

आज गांवों में रहे मंदिर, मस्जिद, भी छोड़कर पुनर्वास हो गया का दावा है तो खोखला ही है। नर्मदा सेवा यात्रा और भक्ति कार्य बढाते रहे सभी राजनेता और नर्मदा भक्त क्या परिक्रमा पथ को पर्यटन केन्द्र बनाते हुए चूप बैठेंगे?

घाटी के लोग अपनी संतुलित, निरंतर और मानवीय विकास की अवधारणा पर हो रहा हमला, नर्मदा की प्रकृति और संस्कृति का हो रहा विनाश और लाभ-हानि के झूठे दावों को चुनौती देने वाला यह सत्याग्रह आज से छोटा बड़दा ग्राम में शुरू होगा जहाँ आज भी 1000 से अधिक परिवार निवासरत है और वसाहट में वंचना और भत्र्सना करने लायक धांधली होती रही है। आज भी 52 किसान परिवारों का भूअर्जन बाकी है तो गरीब मुहल्लों का भी!

राजघाट और जांगरवा में शहादत के बाद अब पुलिस बल या जलबल नहीं, मानवीय पुनर्वास दल और पूरी नर्मदा घाटी के बर्गी, इंदिरा सागर, जोबट,ओंकारेश्वर, महेश्वर, जैसे हर बांध के विस्थापित… घाटी के जल संकट (सूखा और बाढ़ का) भूगतने वाले हजारों अन्य परिवार… सब कुछ विकास नामक  यज्ञ में आहूति नहीं दे, इसीलिए.. राह संघर्ष की हम चुने!

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