ओबीसी समाज आज भी सोया हुआ है !

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-संजीव खुदशाह


पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में अन्य पिछड़ा वर्ग समाज का आरक्षण 14% से बढ़ाकर दोगुना 27% कर दिया गया आदरणीय भूपेश बघेल मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन ने 15 अगस्त 2019 को यह निर्णय लिया यह घोषणा ओबीसी समाज के बिना मांग बिना प्रतिवेदन बिना ज्ञापन के दी गई। इसके बाद एक आश्चर्यजनक घटना घटी।


ओबीसी समाज के चेहरे में ना मुस्कान आई ना बधाइयां दी गई ना बम फोड़े गए । छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अक्सर यह होता है कि जब कोई बड़ा निर्णय लिया जाता है तो या भारत की क्रिकेट टीम विजेता होती है तो जयस्तंभ चौक में प्रदर्शन किया जाता है रैलियां होती है और धमाधम पटाखे फोड़े जाते हैं। 


सवर्णों के 10% आरक्षण में भी बड़ा धूमधाम हुआ । ओबीसी आरक्षण की घोषणा के बाद भी होना यही था। ओबीसी समाज से अपेक्षा थी कि वे जयस्तंभ चौक में पटाखे फोड़ते। ओबीसी बहुल गांव में रैलियां निकाली जाती। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को बधाइयां दी जाती है।उनका सत्कार किया जाता। लेकिन ओबीसी समाज अफीम की नींद सोया हुआ है। ओबीसी समाज के नेता भी सोशल मीडिया तक में बधाई संदेश देने से कतरा रहे हैं। मानो की कुछ हुआ ही नहीं । 


इससे पहले जब 1992 में मंडल कमीशन लागू किया गया था तब भी लगभग ऐसी ही हालत थी तब तो माना जा सकता था कि ओबीसी समाज जागरूक नहीं है। वह रिजर्वेशन नहीं जानता है। मंडल आयोग के बारे में उसे जानकारी नहीं है। इसीलिए उस समय गलतियां हुई। इसी संदर्भ में मैं बता दूं मैं की मंडल कमीशन लागू होने के विरोध में एक ओबीसी समाज के लड़के ने दिल्ली में आत्म दहन तक कर लिया। 


उस युवक जिसका नाम राजीव गोस्वामी था। उसके नाम से आज मेट्रो रेलवे स्टेशन है। राजीव चौक के नाम पर। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ओबीसी समाज की स्थिति क्या होगी। यहां सिर्फ ओबीसी समाज नहीं है । 


अन्य पिछड़ा वर्ग का मतलब होता है सिख समाज के पिछड़ा वर्ग। ईसाई समाज के पिछड़ा वर्ग। मुस्लिम समाज के पिछड़ा वर्ग । किसी ने भी आगे आकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का स्वागत नहीं किया ना किसी प्रकार की कोई उत्साह दिखाया।


असली चुनौती तो अब है।
भूपेश बघेल ने जिस प्रकार से साहसिक निर्णय लिया इसके बाद परिस्थितियां पूरी बदल चुकी हैं। इस बात पर संदेह है कि भूपेश बघेल अकेले पड़ सकते हैं। सवर्ण मीडिया उनके पीछे लग सकता है और उनको विलेन साबित कर सकता है। इसी प्रकार राजनीति में भी छीछालेदर होने की संभावना है। ऐसे वक्त यदि भूपेश बघेल को एससी एसटी ओबीसी का साथ नहीं मिला तो वह अर्श से फर्श पर आ जाएंगे। 


भविष्य में कोई भी दूसरा व्यक्ति इस प्रकार के निर्णय लेने से अपने आप को बचाता रहेगा। लेकिन यदि ओबीसी और आरक्षित वर्ग के लोग उनके साथ खड़े हुए दिखते हैं तो भूपेश बघेल को संबल मिलेगा और उनके विरोध में काम शुरू करने वाले मुख्यधारा की  सवर्ण मीडिया और राजनेताओं को करारा तमाचा नसीब होगा।


इस वक्त ओबीसी समाज एवं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सामने भी कई चुनौतियां हैं इन चुनौतियों का जवाब ओबीसी समाज ही दे सकता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि इस प्रकार के निर्णय लेने वाले इससे पहले के नेता जैसे विश्वनाथ प्रताप सिंह , अर्जुन सिंह, अखिलेश यादव, मायावती, लालू प्रसाद यादव को सामान्य मीडिया बदनाम करती रहती है।

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