‘मिनी राजस्थान’…..शिल्पग्राम, जवाहर कला केंद्र जयपुर।

116

-विरमाराम 
इस परिसर में बने छः परम्परागत ग्रामीण शैली के घर राजस्थान के 6 क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये 6 क्षेत्र हैं बृज (भरतपुर), हाड़ौती (कोटा), आदिवासी (डूंगरपुर), बीकानेर, मारवाड़ (बाड़मेर), शेखावाटी (सीकर) और जयपुर। 
ये ग्रामीण शैली के मकान अलग ही किस्म का सुकून देते हैं।  वो ही nostalgia टाइप। शहर के ठीक बीचोंबीच एक गांव वाली फीलिंग। वो झूम्पे, गुडाल, किणारे और वे दिन। यहां बने बाड़मेर के घर/ढाणी/ढोणी में एक सम्पूर्ण घर के इन सभी हिस्सों को शामिल करने की कोशिश की गई है, यहां मुख्य कक्ष या मुख्य झूम्पा है, गुडाल (बैठक रूम) है, किणारा (अनाज के लिये स्टोर रूम) है और रसोई घर भी। 
बाड़मेर वाली ढाणी हमारे एक फेसबुक मित्र Ummed Singh Choudhary के पिताजी ने बनाई थी। इस साल अगस्त महीने में उम्मेद सिंह जी की एक फेसबुक पोस्ट के मुताबिक “यह ढ़ाणी जो चित्र में दिख रही है यह 1991 में मेरे पिताजी द्वारा बनाई गई थी, उस समय पापा जी घर से एक ट्रक भर के वो सब सामान बाड़मेर से जयपुर लेकर गए थे जो एक रेगिस्तानी घर में जरूर मिलता  है, चाहे उसमें ऊन कातने का चरखा हो या ऊँट पर रखने वाला पिलांन हो , मेरे गांव से उस समय पापा जी के साथ 12 लोग आये थे जिनकी एक महीने की मेहनत से बनी थी यह ढ़ाणी।” (पोस्ट की आखिरी तस्वीर उम्मेद सिंह की फेसबुक पोस्ट के सौजन्य से)
वास्तुकार राजीव खन्ना के प्रयासों से अप्रैल 1993 में शुभारम्भ हुई ये ढाणियां/घर खस्ताहाल हो चुके थे लेकिन पिछले दिनों इनके जीर्णोद्धार (renovation) का काम भी हुआ है। उम्मेद सिंह की अगस्त में पोस्ट की गई तस्वीर और आज की तस्वीर से रेनोवेशन के काम की तस्दीक भी होती है लेकिन मुझे इस काम मे थोड़ी-सी खानापूर्ति भी नजर आई। मसलन बाड़मेर वाली ढाणी के झूम्पों पर जयपुर के आसपास पाई जाने वाली घास डालने की तैयारी है जबकि बाड़मेर में झूम्पों पर खींप या फिर सिणीया इस्तेमाल होते हैं। इसी तरह डूंगरपुर वाले घर के बाहर लिखा था, ‘बांगड़’ जबकि सर्वविदित है कि ये आदिवासी बहुल इलाका ‘वागड़’ कहलाता है और ‘बांगड़’ राजस्थान में वैश्य समुदाय का एक सरनेम है। 
शिल्पग्राम में राजस्थान की पारम्परिक वनस्पति को भी जगह देने की कोशिश की गई है। मसलन, सीकर वाली ढाणी के पास लगा रोहिड़ा, एवं बीकानेर और बाड़मेर वाली ढाणी के बीच लगे खेजड़ी के वृक्ष, साथ ही कई सारे देसी बबूल। हालांकि बाड़मेर वाली ढाणी के पास खड़ा विलायती बबूल (Prosopis juliflora) का बड़ा-सा पेड़ हमारी परम्परागत वनस्पति को लेकर असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है।
इन छः तरह के घरों के अलावा यहां एक बड़ा-सा परिसर और भी है जो ‘रावले’ (गांव के ठाकुर का घर) टाइप लगता है। 
मुझे लगता है कि राजस्थान जिस तरह विविधतापूर्ण प्रदेश है उस लिहाज से इन छः घरों को सम्पूर्ण प्रदेश का प्रतिनिधित्व देना उचित नहीं जान पड़ता है। कुछ और ढाणियां/घर बनाए जा सकते हैं। कम-से-कम 2-4 घरों के लिये तो जगह भी है। 
खैर, घूमने के लिहाज से जयपुर आने वालों को इस जगह पर भी जरूर आना चाहिए। समय तेजी से बदल रहा है, ये स्ट्रक्चर जल्द ही गांवों से भी गायब हो जाएंगे। बच्चे कह रहे थे, “ये गांधीजी के जमाने के घर हैं ना?” वो भी अपने वाले। 
(लेखक जेएनयू से शिक्षा दीक्षा प्राप्त हैं,विदेश मामलों में विद्यावाचस्पति है और वर्तमान में राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के साथ जुड़े हैं )

Leave A Reply

Your email address will not be published.