मेंस्ट्रुअल कप्स- मासिक की चिंता से आज़ादी

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(Nazia Naeem)
जब दो साल पहले ही सैनिटरी पैड्स के नुकसानों के बारे में पोस्ट की थी तो बहुत बहस हुई थी। जगह-जगह टैग मेंशन करके गरियाया गया था कि अभी तो मेंस्ट्रुअल हाइजीन की शुरुआत ही हुई है और मैं फिर से पीछे ले जाना चाहती हूँ। पैडमेन जैसी मूवीज़ देखकर भी मुझे यह समझ नहीं आया कि लाखों अरबों पैड्स से धरती को पाट देने की बजाय सरकारें एक मेंस्ट्रुअल कप क्यों नहीं अवेलेबल कराने के बारे में सोचतीं, 10-15 नहीं तो 5 साल भी चल जाए तो मासिक पर खर्च ख़त्म सा ही हो जाये।

9 सितम्बर को दैनिक भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 75% सैनिटरी पैड्स तयशुदा मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं और मूत्र एवं गर्भाशय संक्रमण से लेकर गर्भाशय कैंसर तक का ख़तरा है। जो सेफ हैं, वे बहुत महंगे हैं और कोई फुल डे तो कोई फुल नाइट प्रोटेक्शन की बात करता है इसलिये भी 4-6 घण्टे में बदले नहीं जाते। अभी केवल 12 प्रतिशत भारतीय महिलाएं इस विकल्प को वहन कर सकती हैं फिर भी औसतन किसी महिला के अपने जीवनकाल में 125-150 किलोग्राम टैम्पन, पैड और ऐप्लिकेटर प्रयुक्त करने का अनुमान है। प्रतिमाह भारत में 43.3 करोड़ ऐसे पदार्थ कूड़े में जाते हैं जिनमें से अधिकांश रिवर बेड, लैंडफिल या सीवेज सिस्टम में भरे मिलते हैं क्योंकि एक तो ठीक से डिस्पोज़ करने की व्यवस्था नहीं होती और दूसरा अपशिष्ट बीनने वाले सफाईकर्मी हाथों से सैनिटरी पैड्स और डायपर्स को अलग करने के प्रति अनिच्छुक होते हैं। जबकि उनको अलग करके उन्हें जलाने के लिए तैयार करना भारत सरकार के नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और हैंडलिंग नियमों के तहत आवश्यक है। मेंस्ट्रुअल कप्स का प्रचलन भारत में अभी आम नहीं हुआ है। छोटे ही नहीं, बड़े शहरों में भी बहुत कम महिलाएं इसका उपयोग करती हैं।

मेंस्ट्रुअल कप्स के कम प्रचलन के कारण : सबसे पहला और सबसे बड़ा तो यही, कि अभी तक कई लोगों ने इसके बारे में सुना भी नहीं है। हमारे शरीर की रचना के प्रति ही इतनी अनभिज्ञता है कि इसके सही प्रयोग का तरीक़ा नहीं पता होता। आज भी समाज में ‘दाग़’ लगने का हौआ इतना बड़ा है कि मासिक स्राव शुरू होने से पहले ही इसका ट्रायल करने के बारे में सोचा जाता है जबकि सर्विक्स माहवारी के दौरान ही इतना नर्म और लचीला होता है कि इसे आसानी से लगाया जा सके। बाक़ी दिनों में बहुत मुश्किल और कष्टप्रद होता है। सही आकार का चुनाव भी समस्या है। उम्र और प्रसव के प्रकार पर यह निर्भर है। शुरुआती एक दो या तीन सायकल तक जब तक ठीक से अनुभव न हो, इसका प्रयोग मुश्किल लगता है और अधिकांश महिलाएं इसी दौरान इसके प्रयोग का विचार त्याग देती हैं। जबकि ठीक से इस्तेमाल करने पर ज़रूरी नहीं कि दिक़्क़त हो ही। ग़लत तरीके से या हाइजीन का ख़्याल न रखते हुए या बड़े नाखून अथवा बलपूर्वक लगाने की कोशिश या अनुपयुक्त साइज़ के कप के चलते कभी कभी योनि में जलन, खुजली, सूजन या लगाने के बाद पेल्विक पार्ट में दर्द हो सकता है, इस वजह से भी कई लड़कियां इसे छोड़ देती हैं।

मेंस्ट्रुअल कप्स के फ़ायदे-सबसे पहला फ़ायदा बचत तो है ही, साथ ही यह विभिन्न प्रकार के संक्रमणों से भी बचाव करता है। सैनिटरी पैड्स या टेम्पून की तरह हाई एब्ज़ॉर्बेंट मटेरियल न होने से ये योनि के स्वभाविक पीएच से कोई छेड़छाड़ नहीं करता, न ही टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम का ख़तरा होता है न ही आसपास की त्वचा में रैशेज़, कटने छिलने और इंफेक्शन का डर। जो लोग विभिन्न मानकों और रिस्क की बात करते हैं, उनकी जानकारी के लिये, ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी 89% आबादी के लिये मेंस्ट्रुअल हाइजीन एक चुनौती है। गाँवों में ही नहीं शहरों में भी निम्न वर्ग की महिलाएं, मज़दूर, भिखारी आदि वर्ग राख, मिट्टी और प्लास्टिक की पन्नियों का इस्तेमाल करती हैं। साफ सूखे सूती कपड़े भी मिलना मुश्किल हैं, उनके लिये एक अदद मेंस्ट्रुअल कप बहुत बड़ी राहत है। इसके अलावा जिनका फ्लो बहुत ज़्यादा है या जो महंगे सैनिटरी पैड्स और टेम्पून नहीं व्यय कर सकतीं उनके लिये भी यह बहुत बड़ी राहत है।खर्च के अलावा भी यह बहुत सुविधाजनक है। एक बार लगाने के बाद आप फ्लो की चिंता से लगभग मुक्त हो जाती हैं। शौच और स्नान के समय इसे निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। तैराकी, राइडिंग, कूदना, दौड़-भाग सब आसानी से कर सकते हैं लीकेज प्रूफ होते हैं। सबसे बड़ी बात, आसानी से खाली करके साफ़ पानी से धोकर पुनः इस्तेमाल किये जा सकते हैं। पीरियड समाप्त होने के बाद 5 मिनट उबलते पानी में स्टरलाइज़ करके अच्छी तरह से सुखाकर रखे जा सकते हैं वापिस।
कौनसा कप उचित रहेगा?
कप्स का कोई स्टैंडर्ड फिक्स साइज़ नहीं है आपके कपड़ों या फुटवियर्स की तरह। स्मॉल और लार्ज साइज़ हर कम्पनी के अलग अलग आते हैं। सामान्य नियम है कि- हार्ड रिम वाला कप चुनें। साइज़ फ्लो से ज़्यादा फिटिंग पर निर्भर है। हार्ड रिम वाले कप लीक नहीं होते आसानी से। अंदर जाकर खुलने और बाहर निकालने में भी सरल होते हैं। पर टीन एज लड़कियां सॉफ्ट रिम वाले स्मॉल कप से शुरुआत कर सकती हैं। पच्चीस वर्ष से कम आयु और वे महिलाएं जिनका सामान्य प्रसव नहीं हुआ है सीज़ेरियन हुआ है, स्मॉल साइज़ से शुरू करें। तीस से अधिक आयु या सामान्य प्रसव वाली या अत्यधिक फ्लो वाली महिलाएं मीडियम या लार्ज लें। यदि किसी क़िस्म की एलर्जी या मेडिकल कंडीशन नहीं है तो पहले कम कीमत के कप्स से शुरुआत की जा सकती है।200-500 रु में उपलब्ध हैं। एक बार आदत हो जाने पर अच्छे ब्रांड के कप ले सकते हैं, ये 10-15 साल चल सकते हैं तो 1000-1200 रु का इन्वेस्टमेंट भी महंगा नहीं है।
प्रयोग का तरीक़ा-
अगर आपने टेम्पून इस्तेमाल किया है तो ये भी बिल्कुल वैसा ही है। पेल्विक मसल्स को बिल्कुल ढीला छोड़ दें। कप की रिम (ऊपर का गोल सख्त हिस्सा) को पानी या वाटर बेस्ड लुब्रिकेंट लगाकर C शेप में मोड़ लें और धीरे धीरे प्रविष्ट करें। अंदर जाते ही यह खुल जाएगा। ठीक तरह से प्रविष्ट किये जाने पर यह बाहर से नहीं दिखता और अंदर वैक्यूम बनने से लीक भी नहीं होता।हालांकि 8-12 घण्टे में निकालने का कहा जाता है पर बेहतर है 6-8 घण्टे में ख़ाली कर लिया जाये। इसके लिये शुरुआत में जब तक ठीक से प्रैक्टिस न हो, टॉयलेट सीट या शॉवर के नीचे सही जगह है ताकि स्पिल होने की स्थिति सम्हाली जा सके। सबसे पहले कप के बेस को चुटकी से पकड़कर सक्शन प्रेशर तोड़िये और धीरे से नीचे की ओर बाहर खींच लीजिये। बहुत जल्दी या तेज़ी नहीं दिखाना है। शुरुआत में स्कूल, कॉलेज, ऑफिस या पब्लिक टॉयलेट्स का इस्तेमाल करने से बचें। घर पर ही कोशिश करें।खाली करने के बाद साफ पानी से धोना पर्याप्त है। किसी डिसइनफेक्टेन्ट का सीधा प्रयोग कप या प्राइवेट पार्ट्स पर न करें।इंटरनेट पर बहुत से वीडियोज़ मौजूद हैं जिनसे प्रयोग विधि समझी जा सकती है।
सावधानियां
FDA से मान्यता प्राप्त अच्छे ब्रांड के लैटेक्स फ्री उत्पाद सबसे सुरक्षित होते हैं। अगर किसी तरह का कोई इंफेक्शन है, जननांगों सम्बन्धी रोग है, अभी अभी प्रसव या गर्भपात हुआ है, आईयूडी डली है या असामान्य गर्भाशय है तो इसका प्रयोग न करें। साफ सफाई का हमेशा ध्यान रखें। सही तरह लगाने निकालने के बाद भी किसी तरह की असुविधा हो जो दो तीन माहवारी चक्र तक चले, कप का साइज़ बदलकर देखें।
अंत में-
मेंस्ट्रुल कप्स बहुत सुविधाजनक हैं और प्रयोग भी इतना मुश्किल नहीं है जितना लग रहा होगा। बस थोड़ी सी प्रेक्टिस की ज़रूरत है। कम से कम तीन महीने दें।

Nazia Naeem की फेसबुक वाल से साभार (लेखिका आयुर्वेदिक डॉक्टर है)

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