बहुसंख्यकवाद से बहुसंख्यकों को नहीं होता कोई लाभ : प्रो. प्रभात पटनायक

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(2 December 2019,Jamia Millia Islamia University) “प्रजातन्त्र का आस्तित्व बने रहने के लिए बहुसंख्यकवाद से मुक्ति आवश्यक है”. यह बात विख्यात मार्क्सवादी अर्थशास्त्री और लेखक प्रो. प्रभात पटनायक ने 18 नवम्बर 2019 को दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में आयोजित 13वें डॉ असग़र अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान में अपने मुख्य वक्तव्य में कही.

विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के सहयोग से सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म (सीएसएसएस) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता जाने-माने राजनीति विज्ञानी प्रो. राजीव भार्गव ने की. व्याख्यान में लगभग 200 विद्यार्थियों सहित, शिक्षाविद, पत्रकार, अध्येता और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे. विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. फुरकान अहमद ने सभी अतिथियों का स्वागत किया. इनमें मणिशंकर अय्यर, प्रो. ज़ोया हसन, नेशत कैसर और विजय प्रताप सिंह शामिल थे.

“प्रजातंत्र बनाम बहुसंख्यकवाद” विषय पर बोलते हुए प्रो. पटनायक ने अत्यंत सहज भाषा में भारत के वर्तमान राजनैतिक आख्यान की सारगर्भित विवेचना की. आज का भारत, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक संघर्ष और उससे उद्भूत विघटनकारी राजनीति से ग्रस्त है. पटनायक ने विस्तार से बताया कि किसी देश में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की परिकल्पना कैसे उपजती है और बहुसंख्यकवाद किस तरह अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने का प्रयास करता है. उन्होंने यह भी बताया कि बहुसंख्यकवाद के उभरने के पीछे क्या कारण होते हैं, कौन से कारक उसे बढ़ावा देते है, प्रजातंत्र पर उसके क्या दुष्प्रभाव होते हैं और उसका मुकाबला कैसे किया जाना चाहिए व किया जा सकता है. श्रोताओं ने प्रो. पटनायक के व्याख्यान का करतल ध्वनि से स्वागत किया क्योंकि वह न केवल विद्वतापूर्ण था वरन भारत की वर्तमान स्थिति के सन्दर्भ में अत्यंत प्रासंगिक भी था. आज के भारत में हम क्या देख रहे हैं? हम देख रहे हैं कि सामाजिक-राजनैतिक और आर्थिक सन्दर्भों में देश में बहुसंख्यकवाद, असहमति के प्रति असहिष्णुता, हिंसा और कमज़ोर वर्गों के बहिष्करण का बोलबाला है. उन्होंने न केवल बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकवाद जैसे शब्दों के अर्थ की विवेचना की वरन उन्होंने बहुसंख्यकवाद पर लगाम लगाने के तरीको पर भी विस्तार से प्रकाश डाला.

अपने व्याख्यान की शुरुआत में प्रो. पटनायक ने बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक को परिभाषित करते हुए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की अनुभवजन्य धारणा और इनके ‘निर्मित किये गए’ अर्थों के बीच अन्तर को स्पष्ट किया. निर्मित किए गए अर्थ स्वतःस्फूर्त नहीं होते. वे जानते-बूझते और योजनाबद्ध तरीके से गढ़े जाते हैं. अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का यह राजनैतिक विभाजन इसलिए किया जाता है ताकि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित किया जा सके. अल्पसंख्यकों के अधिकारों को इस आधार पर सीमित किया जाता है या उनका उल्लंघन किया जाता है कि ‘अल्पसंख्यकों’ ने कुछ ऐसे पाप किये हैं या कर रहे हैं, जिनका प्रतिशोध लेना आवश्यक है. प्रो. पटनायक के विश्लेषण का सच इससे स्पष्ट है कि आज देश में अल्पसंख्यकों का दानवीकरण किया जा रहा है और उनके खिलाफ जूनून भड़काया जा रहा है. और इसे इस आधार पर उचित ठहराया जा रहा है कि मुस्लिम शासकों ने तथाकथित रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार किये थे और उनके साथ क्रूरतापूर्ण व्यव्हार किया था.

परन्तु क्या अल्पसंख्यकों के खिलाफ जुनून भड़काने और उन्हें नीचा दिखने के अभियानों से बहुसंख्यकों की स्थिति में कोई सुधार आता है? क्या इससे बहुसंख्यकों को कोई ठोस लाभ मिलता है? कभी-कभी यह प्रश्न पूछने को जी चाहता है कि नफरत फैलाने के इस अभियान – जिसके कारण कई निर्दोष व्यक्तियों को अपनी जान खोनी पड़ी है और जो सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त कर रहा है – का उद्देश्य आखिर क्या है? इस प्रश्न का उत्तर प्रो. पटनायक ने दिया. उनका तर्क था कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने से बहुसंख्यकों को कोई वास्तविक या भौतिक लाभ नहीं होता. इसके दो कारण हैं. पहला, रोज़गार या अन्य भौतिक लाभों से बहुसंख्यकवाद के पैरोकारों का कोई लेनादेना नहीं होता. और दूसरा, जिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर डाका डाला जाता है वे तो पहले से ही हाशियाकृत और वंचित होते हैं. अतः, उनके अधिकारों को सीमित करने से बहुसंख्यकों को नए अवसर नहीं मिलते. यह बिंदु इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस आख्यान को आज बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा  है वह यह है कि बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के हित परस्पर विरोधाभासी हैं और हमेशा से रहे हैं. प्रो. पटनायक ने एक अन्य गलतफहमी का खंडन करते हुए कहा कि बहुसंख्यकवाद का उद्देश्य अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को उसके विशेषाधिकारों से वंचित करना होता है. प्रजातंत्र या सामाजिक न्याय को मजबूती देना बहुसंख्यकवाद के एजेंडे में कतई नहीं होता.

प्रो. पटनायक ने कहा कि यद्यपि बहुसंख्यकवाद, अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने की उसकी परियोजना को बहुसंख्यकों का समर्थन हासिल होने का दावा करता है परन्तु यथार्थ में उसे आवश्यक रूप से बहुसंख्यकों का समर्थन और सहयोग हासिल नहीं होता. परन्तु हमारी चुनाव प्रणाली में कुछ ऐसी कमियां हैं जो बहुसंख्यकवादी एजेंडे को विस्तार देने में मददगार साबित होतीं हैं. हमारे यहाँ वह पार्टी शासन करती है जिसे सबसे ज्यादा मत मिलते हैं ना कि वह जिसे मतदाताओं के बहुमत का समर्थन हासिल होता है. इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा को पिछले चुनाव में 38 प्रतिशत मत हासिल हुए थे परन्तु फिर भी वह सरकार बनाने में कामयाब रही.

इससे एक नया प्रश्न उपजता है. वह यह कि अगर बहुसंख्यकवाद को बहुसंख्यकों का समर्थन हासिल नहीं होता और ना ही मतदाताओं का बहुमत चुनावों में उसका साथ देता है तो फिर आखिर बहुसंख्यकवाद फलता-फूलता कैसे है. प्रो. पटनायक ने इस प्रश्न का उत्तर दो भागों में दिया. उनका कहना था कि बहुसंख्यकवाद, अनुकूल सामाजिक परिस्थितियों से उपजता है. वह परिस्थिति होती है आर्थिक संकट और इसकी जड़ अर्थव्यवस्था में होती है. उन्होंने कहा कि यद्यपि बहुसंख्यकवाद से बहुसंख्यकों को कोई भौतिक लाभ प्राप्त नहीं होता तथापि बेरोज़गारी और आर्थिक संकट उसके उदय के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध करवाते हैं, विशेषकर यदि आर्थिक संकट के लिए अल्पसंख्यकों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाये.

उन्होंने कहा कि कई अन्य चीज़ें भी बहुसंख्यकवाद के पनपने का कारण बनतीं हैं. हमारी चुनाव प्रणाली में कमियों की चर्चा पहले ही की चुकी है. इसके अतिरिक्त, जनता में व्याप्त डर और असुरक्षा का भाव भी बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देता है.

भय और असुरक्षा के भाव को पैदा करने के लिए विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) जैसे सख्त कानूनों का प्रयोग किया जाता है. इन कानूनों का लक्ष्य होता है असहमति को कुचलना और नागरिक और मानव अधिकारों की मांग करने वालों को चुप्पी साधने पर मजबूर करना.

इसका नतीजा यह हुआ है कि आज सार्वजनिक विमर्श में केवल एकपक्षीय आख्यानों का बोलबाला हो गया है. ये आख्यान अति-राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों के दानवीकरण पर आधारित हैं. देशद्रोह से सम्बंधित कड़े कानूनों के डर से इन आख्यानों के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठती. बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने वाला एक अन्य कारक होता है उसे कॉर्पोरेट-आर्थिक कुलीनतंत्र का समर्थन. इस समर्थन से राजनैतिक दलों को ढेर सारा धन प्राप्त होता है. प्रो. पटनायक ने भाजपा का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसा कहा जाता है कि पिछले आम चुनाव में पार्टी ने लगभग 27,000 करोड़ रुपये खर्च किये, अर्थात हर लोकसभा क्षेत्र में औसतन 50 करोड़ रुपये. राजनैतिक दलों और कॉर्पोरेट घरानों का यह गठबंधन मीडिया पर भी नियंत्रण स्थापित कर लेता है. कुल मिलकर, राज्य पर उनका नियंत्रण स्थापित हो जाता है. इससे बहुसंख्यकवाद के एजेंडे को आगे बढ़ाना और आसान हो जाता है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई ऐसी सरकार शासन में आ ही न सके जो राज्य की शक्ति का प्रयोग बहुसंख्यकवाद का अंत करने के लिए करे.   

प्रो. पटनायक के व्याख्यान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जिसमें उन्होंने उन क़दमों का वर्णन किया जिनके ज़रिये जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में और स्तरों पर बहुसंख्यकवाद को नियंत्रित किया जा सकता है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी भी प्रजातंत्र, विशेषकर भारतीय प्रजातंत्र, जो बहुसंख्यकवाद के चुनौती का मुकाबला कर रहा है, को आगे की राह दिखाता है. उनका पहला सुझाव यह था कि विभिन्न राजनैतिक दलों को सावधानीपूर्वक योजना बनाकर ऐसे दलों के साथ गठबंधन करना चाहिए जो प्रजातंत्र की रक्षा करने के लिए इच्छुक और तत्पर हों. इस गठबंधन में उन दलों को शामिल किया जा सकता है जो अप्रजातांत्रिक कार्यवाहियों जैसे सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं के राजनैतिक उपयोग के विरुद्ध हों, देशद्रोह सम्बन्धी और अन्य ऐसे ही कानूनों को समाप्त करने, लिंचिंग आदि पर नियंत्रण करने के हामी हों. परन्तु उन्होंने चेतावनी देते हुआ कहा कि ये गठबंधन केवल चुनावों में जीत हासिल करने के लिए नहीं किये जाने चाहिए. संघर्ष, दरअसल, उस सोच के खिलाफ होना चाहिए जो बहुसंख्यकवाद को जन्म देती है.

इस सोच से मुकाबला करने के कई तरीके हैं. हमें देश को 1931 में आयोजित कराची कांग्रेस में पारित प्रस्ताव की याद दिलानी होगी. इस प्रस्ताव में नए भारत की परिकल्पना को स्पष्ट किया गया था. यह प्रस्ताव उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद के साथ-साथ उस समावेशी राष्ट्रवाद की बात भी करता है, जिस पर स्वतंत्र भारत की नींव रखी जानी थी. यह राष्ट्रवाद इस अर्थ में समावेशी होता कि उसमें समाज के सभी वर्गों के लिए जगह होती, वह साम्राज्यवादी नहीं होता अर्थात उसका लक्ष्य देश के लोगों पर वर्चस्व कायम करना नहीं होता और वह राष्ट्र को लोगों से ऊपर नहीं रखता अर्थात लोगों की भलाई उसकी पहली प्राथमिकता होती. भारत को आज इसी राष्ट्रवाद की ज़रुरत है न कि युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद की, जिसका आज देश में बोलबाला है.

बहुसंख्यकवाद की सोच से मुकाबला करने का एक अन्य तरीका है संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों को और व्यापक बनाकर उनमें आर्थिक अधिकारों को भी जगह देना. उन्होंने कहा कि वर्तमान में आर्थिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा हैं और उन्हें लागू करवाने के लिए कोई नागरिक न्यायपालिका की शरण में नहीं जा सकता. अम्बेडकर को उदृत करते हुए प्रो. पटनायक ने कहा कि आर्थिक प्रजातंत्र के बिना राजनैतिक प्रजातंत्र अधूरा है. इस कमी को दूर करने के लिए देश के हर नागरिक को एक न्यूनतम जीवनस्तर की गारंटी दी जानी चाहिए और इस अधिकार को न्यायालय के ज़रिये लागू करवाने का हक़ लोगों को दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आर्थिक अधिकारों को मूल अधिकारों में इसलिए शामिल नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारे देश की अर्थव्यस्था इसके लिए ज़रूरी धन जुटाने में सक्षम नहीं है. परन्तु पटनायक का कहना था कि अर्थव्यस्था ऐसी होनी चाहिए जो पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने की बजाय, नागरिकों के कल्याण पर केन्द्रित हो.

प्रो. पटनायक ने कहा कि उन्होंने यह गणना की है कि पांच आर्थिक अधिकारों – भोजन का अधिकार, आजीविका का अधिकार, निशुल्क गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, कम से कम उच्चतर माध्यमिक स्तर तक निशुल्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार और सभी नागरिकों को वृद्धावस्था और शारीरिक अशक्तता पेंशन का अधिकार – देश के सभी नागरिकों को देने के लिए वर्तमान में इन उद्देश्यों के लिए व्यय किये जा रहे धन के अतिरिक्त 11.76 लाख करोड़ रुपयों की ज़रुरत होगी. यह धनराशि देश के सबसे धनी एक प्रतिशत व्यक्तियों पर दो प्रतिशत संपत्ति कर और इन व्यक्तियों को विरासत में प्राप्त होने वाली सम्पति पर 33 प्रतिशत उत्तराधिकार कर लगाकर जुटाई जा सकती है. उनका तर्क था कि पूँजीवादी व्यवस्था में यह अपेक्षा की जाती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मेहनत और योग्यता से मुनाफा कमाएगा न कि विरासत में प्राप्त सम्पति का उपभोग करेगा. इसलिए, उत्तराधिकार पर कर लगाना न्यायोचित है.   

अंत में, प्रो. पटनायक ने चेतावनी दी कि भारत, बहुसंख्यकवाद से फासीवाद की ओर बढ़ रहा है और यह हमारे प्रजातंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती और खतरा है. भारत में प्रजातंत्र के जीवित रहने और फलने-फूलने के लिए यह ज़रूरी है कि हम समावेशी राष्ट्रवाद को अंगीकार करें ना कि हिन्दुत्वादी अति-राष्ट्रवाद को.

प्रो. राजीव भार्गव ने प्रो. पटनायक के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की दो अवधारणाएं होती हैं – एक प्राथमिकता पर आधारित और दूसरी चुनावी गणित पर. अल्पसंख्यक हमेशा वह वर्ग नहीं होता जिसकी आबादी कम होती है. कभी-कभी अल्पसंख्यक वह वर्ग होता है जिसे राजनैतिक संस्कृति को आकार देने की शक्ति और उसके अधिकारों से वंचित किया जाता है. उन्होंने समतावाद पर आधारित सामुदायिक अधिकारों की स्थापना पर भी जोर दिया.

प्रो. पटनायक के विद्वतापूर्ण और विश्लेषणात्मक व्याख्यान की श्रोताओं ने भूरी-भूरी प्रशंसा की. उन्होंने भारत में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के अवधारणा का सूक्ष्म विश्लेषण किया और यह बताया कि बहुसंख्यकवाद किस तरह देश में प्रजातंत्र की जड़ों को कमज़ोर कर रहा है. बहुसंख्यकवाद की जड़ आर्थिक होने के उनके विचार का भी स्वागत हुआ. विशेषकर इसलिए क्योंकि आज भारत की अर्थव्यस्था में आ रही गिरावट लाखों लोगों को गरीबी के चंगुल में धकेल रही है. बहुसंख्यकवाद के खतरे से मुकाबला करने के जो उपाय उन्होंने सुझाये वे अनूठे और एक नए भारत के निर्माण के लिए प्रजातान्त्रिक मूल्यों को मजबूती देने वाले थे.

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