हिंदू समाज समृद्ध और खुशहाल हो,यह मेरी ख्वाहिश है !

215

(डॉ.एम.एल.परिहार)
मैं किसी एक धर्म, संप्रदाय या पंथ से बंधा हुआ नहीं हूं ,मनुष्य का कल्याण यानी मानवता ही मुख्य मार्ग है. लेकिन आज मैं गोरक्षा के मुद्दे पर बहुसंख्यक हिंदू समाज के हित में कुछ कहने की इजाजत चाहता हूं.
गत सप्ताह भर से जयपुर से पाली मारवाड़ के अपने गांव आया हूं. हिंदू बाहुल्य यह इलाका कल तक खेती पशुपालन के लिहाज से बहुत समृद्ध था. हालांकि जात पांत का बहुत घृणित रुप आज भी यहां सड़ांध मार रहा है लेकिन धर्म के नाम पर कभी कोई फसाद तो दूर, छोटी खटपट भी नहीं हुई क्योंकि रीति रिवाज, खेती बाड़ी, व्यापार में हिंदू मुस्लिम एक ही ताने बाने में गुंथे हुए है. 
मुख्य बात पर आता हूं. मारवाड़ इलाका खेती पशुपालन के लिए काफी प्रसिद्ध था लेकिन गो रक्षा के माहौल के कारण पिछले कुछ सालों में सारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है  रोजी रोटी के लिए बहुसंख्यक हिंदू कृषक खेती बाड़ी व दूधारू पशुधन को छोड़कर भारी संख्या में दक्षिण भारत की ओर पलायन कर चुका है. गांव के गांव खाली हो गये हैं इतना तो कश्मीरी पंडितों का भी पलायन नहीं हुआ होगा. और बड़ी वजह हैं पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था का तबाह होना. 
इस क्षेत्र की गाय, भैंस, भेड़ ,बकरी ,ऊंट की विश्वविख्यात नस्लें थी .जगह जगह बड़े बड़े पशुमेले आयोजित होते थे जहां पशुधन की खरीद फरोख्त से सरकार को रेवेन्यू और किसानों को भारी आय होती थी. खेती के काम के उम्दा बछड़े बैल पूरे भारत में जाते थे. ऊन, मृत पशुओं की हड्डी खाल, चर्म व मारवाड़ी जूतियों का बहुत बड़ा बिजनेस होता था. घर घर दूध घी के झरने बहते थे. लेकिन अब तो ग्रामीण बच्चों को दूध घी तो दूर छाछ भी नसीब नहीं हो पाती हैं.गरीब की सेहत पर सीधी मार पड़ी है. खेती बाड़ी व बोझा ढोने में भी बैल बंद हो गए हैं.गोवंश का इतना अधिक सहारा था कि किसान ने कभी आत्म हत्या नहीं की. 
लेकिन यह सब अब गुजरे जमाने की बातें हो गई है.मै अपने इलाके में तबाही का मंजर देख रहा हूं. हिंदू धर्म का भला करने का दावा करने वालों को यह पता ही नहीं है कि वे गांव के किसान गरीब मेहनतकश हिंदू का कितना भारी नुकसान कर रहे है. जिसकी भरपाई मुश्किल है.
जब से गोरक्षा की नफरती हवा चली है गायों के असली रक्षक किसान के सामने रोजी रोटी के लाले पड़ गये है. किसानों ने अपनी सीने पर पत्थर रख कीमती बछड़ों गायों को लावारिस छोड़ दिया. अब हर ओर भूख प्यास के मारे भटकते हजारों कंकालनुमा गायों के झूंड क्षण भर में खेतों को चट कर जाते हैं. कल तक फसलों को रोजड़े (नील गाय) व जंगली सुअरों का ही खतरा रहता था. अब घर के आंगन में बंधा रहने वाला प्रिय गोवंश ही दुश्मन बन गया है.जिसे पूजता था अब लट्ठ लिए भगाता हैं. 
जो खेत बारह महीने फसलों से लहलहाते थे वहां अब विलायती बबूल के जहरीले जंगल फैल गये है. दरअसल ग्रामीणों ने खेती बाड़ी ही छोड़ दी है.भारत भर को कई तरह का अन्न देने वाला यह क्षेत्र अब हर दाने के लिए मोहताज है ,बाहर से मंगवाता है.चमड़े से जुड़ा करोड़ों का कारोबार तबाह हो गया है क्योंकि मृत गाय बैल की भी खाल उतारने का साहस भी कोई कर नहीं पाता हैं. गांव में अब न बछड़ा बिकता हैं और न गाय. इसलिए वह नया पशु भी खरीद नहीं पाता है. विश्व विख्यात सारे पशुमेले मर गये हैं. लावारिस खूंखार गायों व भारी भरकम सांडों को रोकने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता. 
लावारिस गोवंश की प्रकृति ही बदल गई हैं.आए दिन कई बहुसंख्यक हिंदू लावारिस गोवंश के कारण दर्दनाक मौत के शिकार हो रहे हैं लेकिन गोरक्षा की दुहाई देने वालों को गाय के वैज्ञानिक संवर्धन, संरक्षण की रत्ती भर चिंता नहीं है उन्हें ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए कि कल तक  गोवंश समाज की ख़ुशहाली का आधार था लेकिन आने वाले समय में देश मे नजर नहीं आयेगा क्योंकि ऐसे माहौल में किसान गाय पालना छोड़ रहा है. 
समाज में हिंदू बहुसंख्यक है वह समृद्ध व खुशहाल हो ,यह मेरी ख्वाहिश है क्योंकि किसी समाज में बहुसंख्यक की सुखी होना सभी को प्रभावित करता है उसके रीति रिवाजों , जीवनशैली व व्यापार से पूरे समाज व देश की खुशहाली पर असर पड़ता है. लेकिन मौजूदा समय में हिंदू समाज जिस मार्ग पर है, मंदिर, पूजा पाठ, कर्मकांड, धर्म गुरु, गोरक्षा, काल्पनिक अवैज्ञानिक बातों को धर्म के अंग मान कर महिमामंडन करते हुए यह सोच रहा है कि इससे हिंदू धर्म व समाज का भला हो रहा है ऐसा नहीं है. सच्चाई अलग है. 
देश दुनिया के माहौल पर गौर कर हिंदू समाज को तय करना होगा कि हिंदू समाज की खुशहाली किस मार्ग से है. और मेरी कामना है कि बहुसंख्यक हिंदू समाज खुशहाल हो ताकि इनसे प्रभावित होने वाले दूसरे संप्रदाय, समुदाय में भी खुशहाली का असर फैलें. 

 ( लेखक राजस्थान के पहले गोपालन निदेशक रहे हैं )

Leave A Reply

Your email address will not be published.