क्या चुन्नी बाई जैसे लोगों का यही भविष्य है ?

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(भंवर मेघवंशी)
कल चुन्नी बाई से मुलाकात कर आया। राजस्थान के राजसमंद जिले के भीम ब्लॉक के देवडूंगरी गांव के चाक हिरात की निवासी 74 वर्षीया सामाजिक कार्यकर्ता चुन्नी बाई से कल शाम जा कर मिल आया,उनके साथ करीब 2 घण्टे गुजारे, उनकी परिस्थितियों और इन दिनों उनकी सक्रियता पर विस्तृत वार्तालाप हुआ।
चुन्नी बाई और उनके पति मोहन राम जी ने 1987 में हुए भयंकर दुर्भिक्ष के समय अरुणा रॉय जी ,निखिल डे और शंकर सिंह जी व उनके साथियों के साथ मिलकर इस इलाके में न्यूनतम मजदूरी की लड़ाई में सक्रिय हिस्सेदारी की,अकाल राहत कार्यों पर काम किया और पूरी मजदूरी के लिए संघर्ष किया।
बाद में इस लड़ाई ने विस्तार पाया और इस इलाके में किसानों व मजदूरों की एक यूनियन बनी,जिसका नाम मजदूर किसान शक्ति संगठन हुआ। हम सब जानते हैं कि मजदूर किसान शक्ति संगठन याने कि एमकेएसएस ने फ़ोटो कॉपी,मिनिमम वेज और सूचना के अधिकार तथा रोजगार गारंटी कानून के लिए व्यापक जन आंदोलन किये और लोकहित के कईं कानून व नीतियां बनवाने में सफलता पाई।
इन सारी सफलताओं में चुन्नी बाई और मोहन बा जैसे साधारण स्त्री पुरुषों का सहभाग स्मरणीय हैं।इस दलित दंपति ने अपना पूरा जीवन जन हित के इन संघर्षों में लगाया,खुद मुश्किलों में जिये,अभावों में रहे ,पर जन जागरण के काम से पीछे न हटे।
मोहन बा और चुन्नी बाई साक्षर भी न थे,मालवा में कहीं कुएं बावड़ी खोदते थे,मेहनत मजदूरी से जीवन यापन करते थे,कभी घर आये और सामाजिक बदलाव में लगे लोगों से परिचित हुए,उनके काम और भाव को आत्मसात किया और फिर जीवन पर्यंत यही करते रहे।
मोहन बा 2014 में एक दिन अचानक चल बसे,चुन्नी बाई अकेली रह गई, पर लगी रही उसी काम में। दोनों की अद्भुत जोड़ी थी,दोनों साथ चलते रातों में होने वाली कबीर सत्संगों में निर्गुणी भजन बोलते थे और दिन में लोक जागरण के गीत गाते और इन्कलाब ज़िन्दाबाद के नारे लगाते ।
मोहन बा के रचे और गाये गये गीत और उनकी खनकदार आवाज मुझे बेहद प्रिय रही,मैंने मोहन बा का लंबा इंटरव्यू किया,उनके और चुन्नी बाई के साथ बैठकर उनके रचे गीतों को लिपिबद्ध किया,डायमंड इंडिया के लिए उनके आर्टिकल लिखे,उनके गीतों का कैसेट बनाया,उनके साथ मंचों पर पार्श्व गायन किया ,उनके साथ पैदल चला,उनके साथ नारे लगाये, उनके साथ कईं संघर्षों के सहभागी बना।
इस बीच कभी कभी उनके घर जाना होता,वे इंदिरा आवास के एक कब्जाए हुए घर में रहते थे,जमीन थी उनके पास भी थोड़ी बहुत,इस इलाके में बहुत छोटी जोत है,जितनी औरों के पास थी,उससे कम ही उनके पास थी,खेती बाड़ी का समय तो उनको नहीं मिलता था,रातों में भजन और दिन में संगठन का काम,यही उनकी सर्वविदित दिनचर्या थी।
चुन्नी बाई और मोहन बा के दो पुत्र व दो पुत्रियां थी,जिनसे मेरी मुलाकातें हुई,एक बेटी घरेलू हिंसा की शिकार हो गई, बड़ा नेता  छोटा मोटा काम करता रहा,छोटा वाला एक्सीडेंट हो गया,उसके इलाज के लिए संगठन ने उदयपुर में बजरंग लाल शर्मा जी की मदद से भर्ती करवाया ,पर उसने ऑपरेशन नहीं करवाया,वहां से निकल आया,बाद में ब्यावर में भी उसे भर्ती रख गया,लेकिन वहां भी उसने प्रॉपर इलाज नहीं लिया,जिसके चलते उसकी जिंदगी कष्टप्रद हो गई, वह अब पूरी तरह से चुन्नी बाई पर निर्भर है,बुजुर्ग चुन्नी बाई सेवा करवाने की उम्र में अपने बेटे की सेवा में जुटी है,पिछले दिनों चुन्नी बाई की एक पौत्री को सांप ने डस लिया और वह भी चल बसी।
मोहन बा की मृत्यु,बढ़ती उम्र,बेटी का बिछोह,पौत्री का निधन और बेटे का दुर्घटना ग्रस्त होकर बिस्तर पर पड़े रहना जैसी हालात किसी के भी हौंसले तोड़ देती है,चुन्नी बाई के साथ भी यही हो रहा है,संगठन में भी नईं पीढ़ी आ गयी है,जिसे शायद चुन्नी बाई जैसे लोगों के संघर्ष के बारे में समुचित समझ नहीं है,उनकी पीढ़ी के लोग कम हो गए हैं,सोशल मीडिया जेनरेशन के पास वैसे भी बड़े बुजुर्गों के लिए समय कहाँ है ? इस सबसे एक अकेलापन चुन्नी बाई के भीतर उतर गया लगता है।
कल की मुलाकात में भी भावुक होकर बहुत देर चुन्नी बाई रोती रही,उसे मजदूर किसान शक्ति संगठन से कोई शिकायत नहीं है,न ही उन्होंने कहा कि संगठन ने उनको छोड़ दिया है या मदद नहीं कर रहा है,पर अकेलापन और असुरक्षा और बुढ़ापे का संताप सब मिश्रित हो चुके हैं,बहुत साल बाद उनके घर गया तो बहुत खुश भी थी,पर जो आंसू उनकी आंखों में थे,वे खुशी के नहीं थे,वे अकेलेपन और दुःख दर्द के थे।
हालांकि उन्होंने बताया कि उन्हें संगठन से 15 दिन का मानदेय दिया जाता है,पर वे अपना किया हुआ काम की रिपोर्ट कैसे लिखेगी,उनको तो लिखना भी नहीं आता,नए बच्चों के पास शायद उनके लिए इतना वक्त नहीं है।इस तरफ जरूर ध्यान देना चाहिए कि ऐसे निरक्षर बुजुर्ग समाज सेवकों के बुढ़ापे कैसे आराम मिल सके ,इसका कोई मैकेनिज्म तो बनाना ही पड़ेगा।
सरकार के नियमों में चुन्नी बाई के दुर्घटनाग्रस्त बेटे ले लिए राहत की कोई योजना नहीं है,उनके आवास और अन्य सरकारी मदद के प्रति भीम के संवेदनशील विकास अधिकारी डॉ रमेश चन्द्र मीणा ने हाल ही में चुन्नी बाई से मुलाकात की है,कुछ फॉर्मेलिटीज पूरी करवाई है, आगामी सात दिन में मदद का कुछ वादा भी कर गए हैं।
मजदूर किसान शक्ति संगठन भी अपनी इस बुजुर्ग साथी के प्रति संवेदनशील है,पुराने साथी उनके साथ फोन पर सम्पर्क में है और उनकी हर संभव मदद की बात कह रहे हैं।
कुछ दलित संगठनों ने भी कहा है कि वे भी सहयोग का हाथ बढ़ाएंगे,ताकि लोगों के लिए अपना जीवन लगा देने वाली चुन्नी बाई जैसी समाजकर्मी अपने जीवन के आखिरी चरण को ससम्मान बसर कर सकें।
मदद के लिए मीडिया,सिविल सोसायटी और शासन ने अपनी अपनी कवायद शुरू कर दी है,मैंने चुन्नी बाई से वादा किया कि उनसे निरन्तर राब्ता रखा जायेगा और हर संभव मदद की जाएगी।उनके बैंक अकाउंट की डिटेल भी लेते आया,खूब सारी बातों और सांत्वनाओं व साझा यादों का पुनः स्मरण करते हुए फिर से मिलने का वचन दे कर रात में अपने गांव लौट आया ,पर मन में एक सवाल टीस बन गया कि अपनी पूरी ज़िंदगी सामाजिक बदलाव के लिए लगा देने वाले इन साधारण लोगों की आख़िरत ऐसी दयनीय क्यों हो जाती है ? क्या इसका कोई उपाय नहीं है ,क्या हम सबका यही भविष्य है ?
भंवर मेघवंशी( संपादक – शून्यकाल डॉटकॉम )

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