क्या कोटा विवि कर रहा है छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ ?

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(नासिर शाह ‘सूफ़ी’)

अगर आप रात दिन मेहनत करके अपनी परीक्षा की तैयारी करते हैं। शादी, ब्याह, पार्टियां और समस्त मनोरंजन  छोड़कर पहले अपनी पढ़ाई करते हैं तो स्पष्ट है कि इतनी मेहनत करने और कुर्बानियां देने के बाद आपका परिणाम भी उतना ही अच्छा आना चाहिए। अब अगर इतनी मेहनत के बाद भी आपके एक पेपर में जीरो आ जाए तो कैसा लगे जबकि आपके दूसरे सभी पेपर में सो मे से क्रमशः पचहत्तर, चौसठ, अट्ठावन और छियालीस अंक आए हों। जब आप चार पेपर में इतने अच्छे अंक ला रहे हो तो केवल एक पेपर में जीरो आना किसी को भी हजम नहीं होगा।ये कहानी तो सिर्फ स्नातकोत्तर फाइनल ईयर के एक विद्यार्थी की है।

स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के ऐसे ना जाने कितने अनगिनत विद्यार्थियों का हुजूम कोटा विवि के कैंपस में हर वर्ष देखा जा सकता है। ऐसी  समस्या से पीड़ित समस्त विद्यार्थी   पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करते हैं जिनमे से अधिकांश के अंक पुनर्मूल्यांकन परिणाम मे बढ़ जाते हैं और वो उत्तीर्ण हो जाते हैं।अब प्रश्न यह उठता है कि विद्यार्थियों को स्वंय की मेहनत के अंक पाने के लिए इतना समय और पैसा क्यों बर्बाद करना पड़ता है। कई विद्यार्थियों को तो नोकरी से भी हाथ धोना पड़ जाता है।

समस्या यही खत्म नहीं होती है, जिन छात्रों का परिणाम पूरक रहता है वो पुनर्मूल्यांकन आवेदन की फीस भी जमा करा देते हैं और उसके परिणाम  समय पर घोषित नहीं होने से विद्यार्थियो को पूरक परीक्षा में दुबारा फीस भरकर पूरक का भी आवेदन करना पड़ता है और जब पुनर्मूल्यांकन का परिणाम आता है तो अधिकांश विद्यार्थी उसी परिणाम मे उत्तीर्ण हो जाते हैं।अब आप जरा सोचिए की हमे, हमारे ही मेहनत के अंक पाने के लिए तीन-तीन  बार फीस जमा करानी पड रही है। शारीरिक और मानसिक थकान के अलावा समय की बर्बादी हुई वो अलग है।

 ये परंपरा विवि में काफी सालो से ना सिर्फ लगातार चली आ रही है बल्कि दिनों दिन बढ़ती भी जा रही है। एक बेरोजगार विद्यार्थी जो पहले ही कई समस्याओ से ग्रसित रहता हैं उस पर इस तरह की नाइंसाफी उचित नहीं है। इस समस्या से पीड़ित हज़ारों छात्र छात्राएं प्रति वर्ष बिना पुनर्मूल्यांकन आवेदन किए अपनी पढ़ाई वही से छोड देते हैं। उन्हें तो इस बात का अंदाजा भी नहीं होता कि अगर हम पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करते तो शायद उत्तीर्ण हो जाते, वो तो अपने आपको पढ़ाई में नाकामयाब समझकर उसी जगह से हार मानकर काम धंधे पकड़ लेते हैं।अगर समय रहते ऐसी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो हमारे देश की अनेक प्रतिभाओं का पतन निश्चित है।

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