यदि हम उन्हें सिर्फ कोसते रहेंगे,तो वे दसों दिशाओं शासक होंगे,और हम सिर्फ मजदूर !

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(डॉ.एम.एल. परिहार )
आज बहुजन समाज भारी संकट के दौर में हैं. न सरकारी नौकरी, न खेती ,न व्यापार और न राजनीतिक सत्ता. ऐसे मुश्किल समय में भी यदि हम किसी प्लानिंग के साथ आगे बढने की बजाय सिर्फ दूसरी जातियों को कोसते रहेंगे तो हमें फिर से उनके गुलाम होने से कोई नहीं बचा पाएगा. माना कि हमारे साथ हर जगह जातिगत भेदभाव होता है पीछे धकेलने की चारों ओर साजिश हो रही है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बारह महीने इसी का रोना रोते रहे और हालात से उबरने के लिए खुद कुछ नहीं करें. 
अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों को कोसकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना बहुत आसान हैं लेकिन धरातल पर ठोस काम करना बहुत मुश्किल होता है. बहुजन समाज के कुछ संगठन और उनके लीडर तो शुरू से ही एक सूत्री अभियान की तरह बामन बनियों को कोसने का काम कर रहे है उन्हें हर समस्या की जड़ ये ही नजर आते हैं और ऐसे दावे करते हैं मानो इन्हें देश से भगा कर ही दम लेंगे. समाज की खुशहाली के लिए इनके पास कोई भी सामाजिक, शैक्षणिक या आर्थिक एजेंडा नहीं होता है. ऐसे भाषणों से युवा गुमराह हो रहे है.
अंबेडकर के नाम पर आए दिन बनने वाले कागजी संगठनों के दिग्भ्रमित व बौद्धिक स्तर से अपरिपक्व युवा भी दूसरी जाति, धर्म की आलोचना करने को ही मिशन मान लेते हैं और सपना देखते हैं कि हमारा राज होगा. कहीं भी देखो आपसी चर्चा, सभा ,भाषण , सोशल मीडिया में हमारे अधिकतर लोग दूसरी जाति धर्म की आलोचना में ही रस लेते हैं. खूब तालियां बजाई जाती है जबकि बुद्ध बाबासाहेब की विचारधारा घर घर फैलाने का काम बहुत कम  करते हैं.इतिहास गवाह है कि सामाजिक आर्थिक व वैचारिक बदलाव से ही सारे बदलाव होते हैं.
साथियों! बहुत सीधी सरल बात है कि दूसरों के कोसने से अब तक न हमारा भला हुआ है और न आगे होगा. हमने गालियां देने में बहुत समय व ऊर्जा बर्बाद कर ली और यदि आगे भी जारी रहा तो भावी पीढियां कतई माफ नहीं करेंगी. आज हर जाति धर्म में हमारे शुभचिंतक हैं, बहुजनों के हकों के लिए आवाज उठाने वाले लोग हैं भले ही वे कम हैं. दूसरे लोग भी बुद्ध कबीर रैदास फुले अंबेडकर को पढना जानना अपनाना चाहते हैं लेकिन हमने अपने व्यवहार से इन महापुरुषों को घृणा के पात्र बना दिए हैं. मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं है कि कुछ सवर्ण प्रगतिशील लोग इन महापुरुषों को हमसे ज्यादा आचरण में उतारते हैं. हम तो किसी संस्था के पदाधिकारी बनकर या गले में नीला गमछा डाल अंबेडकर के चित्र वाली टी शर्ट पहनकर अंबेडकरवादी होने का ढोल पीटते हैं.
      वर्तमान दौर में जब सरकारी नौकरियां खत्म हो रही हैं तो हमें रोजगार के लिए प्राइवेट सेक्टर पर ही निर्भर रहना होगा जहां उन लोगों का कब्जा हैं जिन्हें हम कोसते रहते हैं. हमारी सभाओं व पंडालों में दूसरों को कोसने वाले लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने ही समाज के गरीबों के लिए रोजगार के दरवाजे बंद करवा रहे है क्योंकि उन्होंने भी सचेत होकर दलितों को अपनी शॉप, स्कूल, ऑफिस, फैक्ट्री कंपनी में नौकरी नहीं देने की गांठ बांध ली हैं. यदि यही हाल रहा तो हमारा शिक्षित युवा भी वहां मजदूर होने को मजबूर हो जाएगा. रोजी रोटी के लाले पड़ जाएंगे क्योंकि बहुजन समाज अभी हर लिहाज से बहुत कमजोर है और वे हर लिहाज से बहुत समृद्ध हैं. यह याद रखना होगा कि विचार व धन की कमी से सारे आदर्श व आंदोलन धराशायी हो जाते हैं. और यही दुर्दशा आज बहुजन समाज के लगभग हर सामाजिक व राजनीतिक संगठन की हो रही है.
 आज जरूरत है कि हम सौहार्द व शांति से दूसरे जाति धर्म की आलोचना किए बिना बुद्ध कबीर बाबासाहेब की करूणामयी मानवतावादी विचारधारा का प्रचार करें. देखना ! लोग ऐसी विचारधारा के आगे नतमस्तक होंगे क्योंकि इसी में समाज की खुशहाली व देश का भविष्य निहित हैं. आज बहुजनों के रोजगार व आर्थिक संकट के दौर में प्राइवेट सेक्टर में छोटा मोटा.बिजनेस शुरू करना है .और बिजनेस सभी से मिलजुल कर ही कर सकते हैं. 
 घृणा व कोसने से हर क्षेत्र में परेशानियां ही पैदा होगी. इससे सामने वालों का कुछ नहीं बिगड़ेगा उल्टा हम खुद अपने गरीब समाज का व आने वाली पीढियों का भारी नुकसान जरूर कर रहे हैं. यदि हमें सामाजिक वैचारिक व आर्थिक रूप से आगे बढना है तो दूसरों को कोसने की बजाय दूसरों से हुनर, ज्ञान व धन कमाने की योजना पर चलना होगा.

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