अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक छात्र डॉ शोएब अहमद से आपकी मुलाक़ात कराता हूँ।

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रवीश कुमार
आज सर सैय्यद डे है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए बड़ा दिन है। इसके छात्र अपने संस्थापक को चाहत से याद करते हैं। वो अपने वजूद में उनके वजूद को भी जोड़ते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पुराने छात्रों के इतने शहरों में संगठन हैं कि उन सभी के प्रोग्राम के लिए हां कर दीजिए, आप दो तीन साल तक घर ही नहीं लौटेंगे। मैं इस साल अटलांटा गया था। वहां 73 साल के हसन कमाल से बात हुई। जितने दिन उनके साथ रहा, वे बस अलीगढ़ के नए छात्रों की मदद और मुल्क की बेहतरी की बात करते रहे। बात कोई भी होती थी वे घूम फिर कर आ जाते थे कि कैसे वहां के मीडिया के छात्रों को अच्छी किताबें दी जाए। बेहतरीन ट्रेनिंग दी जाए। टोकने पर भी कह देते थे कि आप समझते नहीं हैं। वक्त बहुत कम है। अच्छी तालीम देनी होगी। यह हमारा भी फर्ज़ है।  
अलीगढ़ के छात्रों को पता भी है या नहीं कि उनके लिए कोई हसन कमाल साहब इतना सोचते हैं। उनके कारण कुछ ऐसे ही जुनूनी लोगों से मुलाक़ात हुई जो अपने छात्रों की हर संभव मदद के लिए बेताब थे। पैसे और हुनर दोनों से मदद करने के लिए। हसन कमाल वैसे तो बेहद ख़ूबसूरत भी हैं और इंसान भी बड़े अच्छे। अपने काम करने की शहर के चप्पे चप्पे से जानते हैं जैसे कोई अलीगढ़ का छात्र अपने शहर की गलियों को जानता होगा। उनकी मुस्तैदी का क़ायल हो गया। हाथ में एक घड़ी पहन रखी है। आई-फोन वाली। कदमों का हिसाब रखते हैं। शायद इसीलिए फिट भी हैं।  
मुझे लगता है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को हमेशा यूपी की राजनीति से पैदा हुई छवियों के दायरे में रखकर देखा जाता है। उस राजनीति के जवाब में यह यूनिवर्सिटी भी वैसी ही दिखने लग जाती है। जबकि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। अलीगढ़ के छात्रों को अपनी मेहनत और ईमानदारी पर भरोसा रखना चाहिए। यूपी के एक कस्बे में बनी यूनिवर्सिटी के छात्रों की उपलब्धियां किसी भी यूनिवर्सिटी से ज़्यादा हैं। जिस यूपी में कोई यूनिवर्सिटी नाम लेने लायक नहीं बची है, यह बड़ी बात है कि उसके छात्र हर पल अलीगढ़ को याद करते हैं। अलीगढ़ को जीते हैं। एक बार आप इनके कार्यक्रम में चले जाइये। आपके भीतर ये अलीगढ़ भर देंगे। वहां के कमरे, वहां के खाने, वहां की बदमाशियां और लतीफें। .यादें हैं मगर बातें लाइव टेलिकास्औट की तरह करते हैं। 
शायद ही कोई ऐसा हो तो ख़ुद को मज़ाज या ग़ालिब का उस्ताद न समझता हो। हर बात में शायरी। मुझे लगता है कि अलीगढ़ ने अपने छात्रों की उपलब्धियों को ठीक से संजोया नहीं। तो इसकी शुरूआत मैं करता हूं।  इस बार न सही, अगली बार जब आप सर सय्यद डे मनाएं तो इसके छात्रों की उपलब्धियों को याद करें। डॉ शोएब अहमद। 1984 में रामपुर से स्कूल की पढ़ाई कर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे। वहां बायोकेमिस्ट्री में मास्टर किया। उसके बाद Industrial  Toxicology  Research Centre, लखनऊ से एम फिल की। फिर ब्रिटेन चले गए र कार्डिफ में वेल्स कॉलेज ऑफ मेडिसिन से पीएचडी की। इसके बाद यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना, लास एंजेलिस से पोस्ट डॉक्टरल की पढ़ाई की। इस तरह रामपुर से निकला एक लड़का 1984 से 2003 तक पढ़ाई की अपनी यात्रा तय करता है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने पांच साल के दौरान उन्हें केमिस्ट्री और बायो केमिस्ट्री में इतना दक्ष कर दिया कि वे दो और मुल्कों की यूनिवर्सिटी में अपना रिसर्च कर सके। उसके बाद दस साल अटलांटा में Emroy  University School of Medicine में पढ़ाया। लेकिन कम बोलने वाले शोएब अहमद के भीतर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी इस तरह बसी है जैसे कल ही निकले हों। यही अलीगढ़ है। आपके भीतर से निकलता नहीं है। 
डॉ शोएब इस वक्त MyGenomics  नाम से अपनी कंपनी चलाते हैं। कैंसर की स्क्रीनिंग करते हैं। दुनिया भर से सैंपल आता है और वे जांच कर बताते हैं कि किसी को कैंसर होने की कितनी आशंका है। चांस है। यानि अब अपना काम करते हैं। हम अमरीका या बाहर गए लोगों की कामयाबी को पैसे से आंकते हैं। अगर आपने ऐसा किया तो डॉ शोएब की यात्रा को समझने में ग़लती कर जाएंगे। फोटोग्राफी का शौक़ रखते हैं। इनकी कार की डिक्की में अच्छे कैमरे रखे हैं। ड्रोन कैमरे का सेटअप है। हमें अपनी कार से अटलांटा के एक गांव ले गए। ड्रोन कैमरे को आज़मा रहे थे और फोटोग्राफी पर लेक्चर दे ही रहे थे कि ट्रैक्टर दौड़ाते हुए किसान आ गया। एकबार के लिए लगा कि हम शामली में घिर गए हैं! पर ख़ैर। 
डॉ शोएब के साथ कुछ घंटे बिताने का मौक़ा मिला। उनकी पूरी बातचीत इसी में ख़त्म हो गई कि मुल्क की बेहतरी कैसे होगी। वो हिन्दुस्तान को बेहद प्यार करते हैं। अपनी यूनिवर्सिटी के छात्रों को नए दौर के रिसर्च से जोड़ना चाहते हैं। रामपुर और अलीगढ़ में घूम-घूम कर खाने की आदत लगी होगी इसलिए उन्हें ख़ूब पता था कि अटलांटा का लोकल खाना-पीना क्या है। यह किसी भी यूनिवर्सिटी के लिए गर्व की बात है कि उनके छात्रों के लिए 25 साल पहले निकला छात्र दिन-रात सोचता है।  
बोलने का सलीक़ा अच्छा है। एक तो कम बोलते हैं तो ग़लती कम होती है और दूसरा जब बोलते हैं तो अदब आगे कर देते हैं। इनकी ज़बान से उर्दू उतरी नहीं है। अंग्रेज़ी का रस चढ़ा नहीं है। जबकि इनका पेशा और रिसर्च अंग्रेज़ी का ही है। बहुत ही ख़ूबसूरत परिवार है। 
अगले पोस्ट मे मैं आपको पानी की तकनीक पर काम करने वाले राशिद अहमद साहब, यासिर जिनसे दोस्ती हो गई है और अन्य कुछ लोगों की कामयाबी के बारे में बताऊंगा। कब लिखूंगा, यह मेरे मूड पर निर्भर करता है। मेरा बस इतना ही कहना है कि अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को आप उसके मक़सद के चलते याद करते हैं तो उसका एक बेहतर तरीक़ा यह भी है। इसके चमन से निकले छात्रों को याद कीजिए। आप सभी को मुबारक़। आपकी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी आपको संवारती रहे और आप उसकी ख़ूबसूरत यादों से अपने आगे की यात्रा करते रहें।
(लेखक की फेसबुक वॉल से साभार )

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