एट्रोसिटी एक्ट को लागू करने में विफल रही हरियाणा सरकार !

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-भंवर मेघवंशी

देश की राजधानी से सटे राज्य हरियाणा में अनुसूचित जाति,जनजाति अत्याचार निवारण कानून का क्या हश्र है,इसकी एक बानगी 12 अक्टूबर 2019 को करनाल जिला मुख्यालय पर आयोजित एक जनसुनवाई में दिखलाई पड़ी ,जनसुनवाई के दौरान 14 मामले ज्यूरी के समक्ष रखे गये थे ,उनमें से 6 में जबरन समझौता करवा दिया गया तथा एक में जवाबी प्रकरण (काउंटर केस) के चलते कोई राहत नहीं मिल पाई,सिर्फ 2मामलों में पीड़ित प्रतिकर का भुगतान किया गया था और महज 3 मामलों में चार्जशीट फाइल की गई,जिसमें से 1मामले में जाति प्रमाणपत्र होने के बावजूद एट्रोसिटी एक्ट चालान के वक्त हटा लिया गया।

इस जनसुनवाई का आयोजन सामाजिक संगठन ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की ओर से करनाल के रविदास भवन में किया गया ,जिसमें पीड़ित दलित महिलाएं ,उनके परिजन ,उनकी पैरवी कर रहे वकील,उनको न्याय दिलाने के लिये लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ लोग शामिल हुये.

हरियाणा में दलित महिलाओं की स्थिति काफी खराब है,उनके साथ छेड़छाड़,बलात्कार,अपहरण और सामूहिक बलात्कार व यौन हमलों में निरन्तर वृद्धि हो रही है,वैसे राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि अन्य राज्यों की तुलना में हरियाणा काफी शांतिपूर्ण राज्य की श्रेणी में आता है,दावा किया जाता है कि हरियाणा में अपराध बहुत कम है ,इसका कारण यह बताया जाता है कि हरियाणा पुलिस तत्परता से केसों का शीघ्र निपटान करती है,पर यह सच्चाई दलित अत्याचार के मामलों में पलट जाती है,पुलिस की तत्परता व संवेदनशीलता दोनों ही गायब हो जाती है,जांच अधिकारियों के जातीय पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से सामने आने लगते हैं।

हरियाणा में दलित महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की एक टीम वर्ष2007 से ही राज्य में कार्यरत है,इस टीम का नेतृत्व युवा महिला एडवोकेट मोहिनी करती है,उनके साथ मंजू,रुबीना,पूजा ,मनीषा इत्यादि युवा सामाजिक कार्यकर्ता काम देखती है।हरियाणा में मंच की मुख्य गतिविधियों में दलित महिला अत्याचार प्रकरणों की मॉनिटरिंग करना,फैक्ट फाइन्डिंग्स, कानूनों की जानकारी देना तथा पीड़िताओं को आर्थिक अनुतोष दिलाने और पुलिस,प्रशासन व मीडिया को दलित महिलाओं के मुद्दों पर संवेदनशील बनाना है।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक हरियाणा की दलित आबादी 51,13,615 है,जिनमें महिलाएं 24,03,959 है और पुरुष 27,09,656 है।दलितों की बड़ी आबादी आज भी गांवों में बसी हुई है और वो अपने जीवन यापन के लिए खेतिहर मजदूरी,नाली सफाई, चप्पल जूतों का काम,मैला ढोना,शौचालयों की सफाई सहित कईं तरह के मेहनत मजदूरी के कामों में रत है। 

चूंकि हरियाणा हरित क्रांति क्षेत्र रहा है,यहाँ के लोगो का मुख्य व्यवसाय खेती करना है,जिसमें बड़ी संख्या में कृषि मजदूरों की जरूरत होती है,इस कमी को पूरा करते है भूमिहीन दलित कृषि मजदूर।कईं बार तो पूरे परिवार ही मजदूरी करते है।

हरियाणा में दलित औरतों के हालात के बारे में बताते हुए ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की हरियाणा राज्य की संयोजक मोहिनी कहती है कि -” राज्य में दलित महिलाओं की स्थिति बेहद दयनीय है,आये दिन दलित महिलाओं के ऊपर हिंसा होती है,उनके साथ बलात्कार,अपहरण,डायन बताकर मारपीट व हत्या तथा छेड़छाड़ व सामूहिक बलात्कार की घटनाएं होती रहती है।लेकिन शासन,प्रशासन व पुलिस का रवैय्या बहुत असंवेदनशील है.”

अगर हम हरियाणा पुलिस के आंकड़ों को देखें तो मोहिनी की बातों की तस्दीक होती है,वर्ष 2019 की जनवरी से लेकर मई तक के पांच माह के रिकॉर्ड को देखें तो पता चलता है कि दलित एट्रोसिटी के कुल 226 मामले ही दर्ज किए गये, उनमें भी 44 मामलों में तो साफ तौर पर दलित अत्याचार होने के बावजूद एट्रोसिटी एक्ट की धाराएं नहीं जोड़ी गई,कुछ मामलों में जांच के दौरान एट्रोसिटी एक्ट हटा दिया गया।

ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की टीम ने 19जनवरी 2019 से जून 2019 तक के 20 केसों को सैम्पल मानकर उनकी गहन पड़ताल की ,इन प्रकरणों में अधिकतर मामले नाबालिग लड़कियों के अपहरण,बलात्कार,सामूहिक बलात्कार व उन्हें देह व्यापार में धकेलने जैसे गंभीर प्रकरण थे।

इस जनसुनवाई में बतौर ज्यूरी मैम्बर मैं भी शामिल हुआ, मेरे अलावा नेशनल दलित जस्टिस मूवमेंट के डॉक्टर वी ए रमेशनाथन, ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की राष्ट्रीय महासचिव आशा जकारिया,चंडीगढ़ हाईकोर्ट के एडवोकेट सुनील रंगा, एडवोकेट आरती,राजस्थान हाईकोर्ट के एडवोकेट ताराचंद वर्मा आदि शामिल थे,कार्यक्रम का संयोजन सुमन देवठिया और मोहिनी ने मिलकर किया।

हरियाणा में वर्ष 2018 -19 के साल में कुल 226 दलित अत्याचार के मामले थानों में पहुंचे,जिनमें हत्या के14,बलात्कार के 41,छेड़छाड़ के 44,अपहरण के 7 मामले दर्ज किए गए,शेष डकैती,गंभीर चोट,उपद्रव व अन्य अपराधों में दर्ज रिकॉर्ड है,इनमें से 3 हत्याओं,8 बलात्कार,7 छेड़छाड़,4अपहरण ,2 हत्या के प्रयासों के मामलों में पुलिस ने एट्रोसिटी एक्ट लगाना भी उचित नहीं समझा। जनसुनवाई में एक तो इतना संगीन प्रकरण आया,जिसमें दलित घुमन्तू जाती की एक नाबालिग लड़की को बंदी बना कर लगातार 44 लोगों के द्वारा बलात्कार किये जाने और लड़की को देह व्यापार में धकेल देने,बेच देने जैसा प्रकरण था,ज्यूरी मेम्बर्स को मुहैया करवाई गई दस्तावेजों में तहसीलदार द्वारा जारी लड़की का जाति प्रमाण पत्र शामिल था,मगर पुलिस ने लड़की को दलित मानने से इंकार कर दिया,क्योंकि पीड़िता बादी नामक घुमन्तू समुदाय की थी,जिनके नाम मुस्लिम जैसे होते है।एक अन्य प्रकरण में दलित युवा की हत्या कर दिए जाने और नामजद रिपोर्ट के बावजूद एट्रोसिटी कानून की धारायें नहीं लगाई गई।

ज्यूरी मेम्बर डॉ रामेशनाथन ने अपने रिमार्क में साफ तौर पर कहा कि हरियाणा सरकार दलित महिलाओं के मामले में बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं है,वह एट्रोसिटी एक्ट को लागू करने में पूर्णतः विफल रही है।

जनसुनवाई पैनल के समक्ष आये 14 मामलों में हत्या,बलात्कार,गैंग रेप,आगजनी व भूमि विवाद व बाल नहीं काटने पर जानलेवा हमला करने जैसे मामलों के पीड़ित व परिजनों ने अपनी व्यथा सामने रखी।

इस जनसुनवाई से अनुभव हुआ कि हरियाणा की खट्टर सरकार ने दलित अत्याचार विरोधी कानून को अपने राज्य में लागू न करने का संकल्प ले रखा है और गंभीर अपराधों में भी इस कानून की धाराओं के इस्तेमाल न करने का मौखिक आदेश जारी कर रखा है।

यह कहा जा सकता है कि हरियाणा में एससी एसटी एक्ट को अघोषित रूप से खत्म कर रखा है,पीड़ित अगर जागरूक है तो मामला एट्रोसिटी में  दर्ज कर लेते है,मगर जानबूझकर कमजोर धाराएं लगाते हैं,अकसर काउंटर केस दर्ज कर लिए जाते है ताकि पीड़ित पक्ष दबाव में कर समझौता कर लें।पीड़ितों का सामाजिक आर्थिक बहिष्कार किया जाता है,उनको डराया धमकाया जाता है,गांव से निष्कासित करने के नाम पर समझौता करने का दबाव डाला जाता है,तफ्तीश के दौरान जांच अधिकारी पीड़ितों को डराते है,चालान के वक्त एट्रोसिटी की धाराएं हटा देते हैं,एक्ट के नियमानुसार मुआवजा नहीं दिया जाता है।

कोर्ट में पीड़ित परिवारों को वकील नहीं मिल पाते हैं,लोक अभियोजक की भूमिकाओं को लेकर भी पीड़ितों ने सवाल उठाए हैं।पीड़ितों की सुनवाई,उनकी शिकायतों पर कार्यवाही और पीड़ित पक्ष की सुरक्षा का कोई मैकेनिज्म काम नहीं करता है,अन्ततः दलित अत्याचार के अधिकांश मुकदमें अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही दम तोड़ देते हैं और विरोधियों को यह दुष्प्रचार करने का मौका मिल जाता है कि एससी एसटी एक्ट में तो ज्यादातर मामले झूठे दर्ज करवाये जाते हैं।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है )

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