ग्रेटा थंबर्ग की पर्यावरणीय चिन्ता !!

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( स्कन्द शुक्ला )
जब स्वीडन की वह किशोरी ग्रेटा थन्बर्ग एक यॉट पर बैठकर सागर पार गयी , तो अचम्भे और अविश्वास के स्वर गूँजने ही थे। 
ग्रेटा थन्बर्ग का नाम बहुख्यात हो चुका है। वे अभी वयस्क तो नहीं हुई हैं , पर उन्होंने संसार-भर में पर्यावरण को लेकर एक जागरूकता-मुहिम छेड़ रखी है। उनके अनेक प्रयासों में नवीनतम तब जुड़ा , जब ग्रेटा कार्बन के रेशों से बनी एक यॉट ( नाव ) पर सवार होकर पर्यावरण-गोष्ठियों में भाग लेने न्यूयॉर्क पहुँचीं। वे हवाई यात्रा कर सकती थीं , उन्होंने अटलांटिक के जलमार्ग को चुना ताकि पेट्रोल की खपत को घटाने में योगदान दिया जा सके। 
अनेक लोगों को ग्रेटा का यह काम उनकी सनक लग सकता है। संसार-भर के लोग जीवाश्म-ईंधन के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए हवाई जहाज़ों से चलना बन्द नहीं कर सकते। यह व्यावहारिक नहीं है। और इसी अव्यावहारिकता-बोध के प्रभाव में आकर ढेरों लोग एक बात कहते हैं : “पर्यावरण बर्बाद हो रहा है , सच है। लेकिन इसे बचाना न मुझ अकेले के बस में है और न उससे कुछ होगा। यह काम सरकारों का है और इसकी सफलता-असफलता उनके सिर-माथे आएगी।”
पर्यावरण के रक्षण के लिए निजी योगदान देना किसी एक नागरिक का वोट देने के लिए निकलने जैसा है। सभी जानते हैं कि एक वोट का महत्त्व न्यूनतम है , लेकिन मतदान के लिए लोकतन्त्र में उत्प्रेरण की प्रथा है। अधिकाधिक लोग बूथों तक पहुँचें और अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करें। महत्त्वपूर्ण यह बाद में है कि वे किसे चुनते हैं। प्राथमिक महत्त्व इसका है कि वे तन्द्रिल नहीं हैं , अपने लोकतान्त्रिक हित के प्रति वे सजग-सचेत है। 
तो क्या ग्रेटा थन्बर्ग जैसे पर्यावरण-सेनानी ( सेनानी ही कहूँगा ! ) संसार-भर को यह दिखाने निकले हैं कि वह कितना अँधेरे में है ? क्या उनकी यह मुहिम दुनिया को ज़लील करने की कवायद-भर है ? या फिर उनके इन प्रयासों को किन्हीं और अर्थों में व्याख्यायित करके देखा जाना चाहिए ?
ग्रेटा जानती हैं कि उनका प्रभाव लोगों पर है। प्रभाव का गुण जिसमें हो , उसकी सार्वजनिकता बदलावकारी होती है। वह अनचुना नेता होता है , उसका अनुकरण-अनुसरण लोग करते हैं। वे ही लोग जो सरकारें चुनते हैं , वहाँ प्रतिनिधि भेजते हैं। ऐसे में ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’ की विचारधारा से इतर सोचने की ज़रूरत इस रूप में है कि पका फल फलों की पूरी कच्ची टोकरी को पका देता है। 
मैं जानता हूँ कि कहावत पकने पर नहीं , सड़ने पर है। सड़ा फल पूरी टोकरी सड़ा देता है। लेकिन सड़ने के बुरे उदाहरण से भिन्न अच्छे एकानेकी प्रभावों को भी अपने आसपास देखा जा सकता है। सड़ना दरअसल पकने की इन्तेहाँ है। जब पकन को भोजन के रूप में तवज्जो नहीं मिलती , तब वह सड़ने का रास्ता चुनता है। 
दुनिया फलों की एक टोकरी है , जिसे शीघ्रातिशीघ्र पकाना है। ग्रेटा थन्बर्ग के लोकहितकारी आचार-विचार से संसार-पक्विका एथिलीन गैस निकल रही है। उनका स्वयं पक्वन हो चुका है , वे जाग चुकी हैं। ऐसे में उनके कृत्य संसार के अधिसंख्य अधपकों के लिए पर्यावरणीय हॉर्मोनी उत्प्रेरण हैं , जो बदलना जानते नहीं अथवा साहस नहीं कर पा रहे। 
अधिसंख्य अच्छे बदलाव समाज से सरकार की ओर जाते हैं। कॉमन मेन-वीमेन की क्रान्तियाँ ही कैबिनेटों तक पहुँचती हैं। 

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