यह कैसा आंबेडकरवाद है ?

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(वीरेंद्र यादव)
यह कैसा आंबेडकरवाद है ,जो गांधी और गोडसे को एक ही पंक्ति में खड़ा करता है? यह आत्मघाती है और दलित विमर्श के प्रति विकर्षण पैदा करने वाला है। विनम्र निवेदन है कि इससे बचिए और संघ को गांधी के समतुल्य बताने और बनाने से बाज आइए। 
मैं यशपाल की ‘ गांधीवाद की शव परीक्षा ‘ का कायल हूं ,आंबेडकर की गांधी की आलोचना को स्वीकार करता हूं । लेकिन गोपाल गोडसे की पुस्तक ‘गांधी वध क्यों’ के तर्कों को नहीं मानता। उसे मानना आरएसएस के साथ खड़ा होना होगा। इसलिए जरूरी है कि गांधी और गोडसे को एक ही ‘बीमारी’ समझने के अतिवाद से स्वयं को बचाइए।
आंबेडकर -गांधी के वाद,विवाद और संवाद का एक अहम पहलू यह था कि आंबेडकर के विचारों से तर्क-वितर्क करते हुए गांधी वर्णाश्रम और जाति को लेकर अपनी पूर्व स्थिति से अधिक लचीले और वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रति पहले सरीखे आग्रही नहीं रहे थे। गांधी के व्यक्तित्व का मुख्य अंतर्विरोध व्यापक मानवीयता का पक्षधर होते हुए हिन्दू धर्म की वर्णाश्रमी व्यवस्था को तोड़े बिना दोनों के बीच ताल मेल बैठाना था। आंबेडकर की आधुनिक समतावादी चेतना गांधी के इस अंधविंदु के तीव्र और शतप्रतिशत विरोध में थी। कहा जा सकता है कि गांधी आधुनिकता के अतीत थे तो आंबेडकर इसके भविष्य। 
सच यह है कि गांधी की सीमाओं को आंबेडकर के बिना जिस तरह नहीं समझा जा सकता ,उसी तरह आंबेडकर की संभावनाओं को गांधी के बिना नहीं समझा जा सकता। गांधी और आंबेडकर का असमाधेय होना समतावादी मूल्यों पर आधारित व्यापक मानवता के हित में है। 
गांधी और आंबेडकर का एक साथ अधिग्रहण असम्भव है और यही  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उस धूर्तता को उजागर करने वाला है, जो न तो गांधीवाद के प्रति ईमानदार है और न आंबेडकरवाद के प्रति। वामपंथ का गांधीवाद से दूर होना और आंबेडकरवाद के निकट होते जाना मार्क्सवाद द्वारा भारतीय परिस्थितियों का स्वीकार और अपनी सैद्धांतिक जड़ता से मुक्त होना है। गांधी और आंबेडकर दोनों से संवाद किए बिना यह संभव नहीं था। 
अंततः गांधीवाद और भारतीय वामपंथ दोनों के लिए आंबेडकर एक जरूरी प्रस्थानबिंदु सिद्ध हुए हैं। आज यदि गांधीवादी जाति उन्मूलन के पक्षधर और वामपंथी जाति की भारतीय समाज में अनिवार्य शोषणकारी उपस्थिति को स्वीकार करते हैं तो यह आंबेडकरवाद की ही देन है। इस सच्चाई को स्वीकारना ही होगा।
(लेखक प्रसिद्ध आलोचक हैं )

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