धम्मभूमि थाईलैंड : भ्रांतियां एवं सत्य

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(डॉ.एम.एल. परिहार)

इन दिनों हम दस साथी थाईलैंड (सियाम देश ) की यात्रा पर हैं. राजधानी बैंकॉक के बुद्ध विहारों के अलावा सवा सौ किमी. दूर प्राचीन राजधानी अयूथ्या व ग्रामीण क्षेत्र का भी भ्रमण किया. भारत की तरह थाईलैंड का भी बुद्ध व धम्म का गौरवशाली इतिहास रहा है और आज भी यहां की समाज की समृद्धि, संस्कृति ,स्वास्थ्य व कार्यशैली में शान से झलक रहा है. यह देश कभी किसी का गुलाम नहीं रहा. थाई का अर्थ होता है स्वतंत्र.
धार्मिक कर्मकांडों व अंधविश्वासों से दूर विशाल प्राचीन बुद्ध विहार व ग्रामीण धम्म संस्कृति को देखकर साफ हो जाता है कि यहां धम्म यहां के समाज की खुशहाली की बड़ी वजह है . यहां बुद्ध को दिखावे की बजाय जीवन में अपनाया जाता है. भिक्षुओं का स्तर बहुत ऊंचा होता है जो सिर्फ धम्म प्रचार में रत रहते हैं.
चकाचौंध से भरपूर आधुनिक बाजारों ,विज्ञापनों, विहारों व घरों से बाहर कहीं भी बुद्ध का चित्र तक नजर नहीं आता हैं. हालांकि 96% लोग बुद्ध के अनुयायी हैं लेकिन यह बौद्ध देश होने का एलान नहीं करते हैं. आम लोग बहुत ही सभ्य, सौम्य, मेहनतकश ,ईमानदार , विनम्र व धाम्मिक होते हैं. महिलाओं का बहुत सम्मान जनक स्थान है. धाम्मिक व मेहनती होने के कारण हर कोई तन और मन से स्वस्थ नजर आता है, मोटापा कहीं नजर नहीं आता है. यहां की जीवनशैली बहुत अनुकरणीय है.
यहां गांव से लेकर शहरों तक में ट्राफिक अनुशासन व सफाई का बहुत खयाल रखा जाता है. आज ही गोल्डन बुद्धा विहार को देखकर हम सभी बाहर रोड के पास खड़ी अपनी बस में बैठने जा रहे थे. उसी दौरान एक अन्य इंडियन ग्रुप बस से उतर रहा था. उनमें से एक ने सड़क पर थूंक दिया. पास ही खंभे पर कैमरे लगे हुए थे ,पल भर में पुलिस आ गई और उस व्यक्ति से पांच हजार रुपये जुर्माना वसूल किए. बचने के लिए बहुत हाथाजोड़ी की, माफी मांगी लेकिन पुलिस ने एक नहीं सुनी. यही कारण है कि बैंकॉक शहर बहुत साफ सुथरा नजर आता है. लेकिन हम इंडियन लोग वहां भी अपनी बेईमानी व गंदगी फैलाने की आदत से बाज नहीं आते हैं. ज्यादातर टूरिस्ट इंडियन होते हैं .वहां भारतीय मूल का एक छोटा व्यापारी भीड़भाड़ के मार्केट के बाहर इन्हें देखकर अलग अलग गुटखों के नाम लेकर चुपके से बेचते नजर आया जबकि वहां पान गुटखा की दुकान कही नजर नहीं आती है. यहां बुद्धिस्ट अपनी शॉप में या तो बुद्ध की एक छोटी प्रतिमा लगाते हैं या वह भी नहीं .लेकिन वहां इंडियन अपनी शॉप में तैतीस करोड़ तस्वीरे लटका देते हैं .
थाईलैंड के पटाया शहर के एक भाग की अलग कल्चर को लेकर इंडियंस लोग पूरे थाईलैंड व बुद्धिज्म को बदनाम करते हैं. लेकिन ऐसा तो भारत में भी चुपके से,भ्रष्ट व विकृत रूप से हो रहा है या धर्म की ओट में घटित हो रहा है. जहां स्त्रियों को नारकीय जीवन भोगना पड़ रहा है. आज ऐसी यौन अतृप्ति के कारण पूरा समाज इस तरह के अपराधों से विकृत हो रहा है जिसकी फिक्र होनी चाहिए. फिर विश्व के कई देशों में यौनकर्म वैधानिक रूप से मान्यताप्राप्त है. दरअसल जरूरत है इसके कारणों को जानना व खुले दिमाग व प्रगतिशील सोच से हल निकालना.
थाईलैंड का शहरी व ग्रामीण परिवेश आज भी बुद्ध, धम्म और संघ की गौरवशाली संस्कृति से सुगंधित है और वह भारत का बहुत सम्मान करता है, आभार प्रकट करता है. जहां से उन्हें यह संस्कृति मिली है. आज मानवतावादी बुद्ध की शिक्षाओं को धम्म व ध्यान के रूप में पूरे संसार में बहुत तेजी से पढा, जाना व अपनाया जा रहा है. करूणा का उजियारा दिनोंदिन अधिक फैल रहा है.
……भवतु सब्ब मंगलं…..

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