दलित आत्मकथाएं : सिर्फ विलाप और शोषण की कहानियाँ !

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( संजय श्रमण )
बहुत गई अपने दारिद्रय और पिटने की कहानियाँ यानी दलित साहित्य की समस्याएँ और समाधान !


कोई भी साहित्य जिस किसी भी वर्ग या समुदाय के ज्ञानवर्धन के लिए लिखा जाता है उसी को लाभ होता है। दलन या शोषण का साहित्य दलितों या ट्राइबल के दलन की बात अवश्य करता है लेकिन यह दलितों या ट्राइब्स को जागरूक करने के लिए नहीं लिखा जाता। यह द्विजों को जागरूक करने के लिए लिखा जाता है।


इसी तरह सोशियोलॉजी या एंथ्रोपोलॉजी की रिसर्च रही हैं। वे द्विजों के ज्ञानवर्धन के लिए बहुजनों की सामाजिक धांर्मिक समस्याओं को उघाड़ती है। 


उपनिवेश काल की एंथ्रोपोलॉजी ने ब्रिटिश यूरोपीय आकाओं के ज्ञानवर्धन हेतु भारत के इतिहास और दर्शन आदि की सारी खोजें कीं। इसका लाभ आज भी वे ही उठा रहे हैं।


यह बात नोट करके रख लीजिए कि जिसका अध्ययन होता है वह हमेशा शोषित होगा। जो अध्ययन करेगा वह राज करेगा। 


जो राज करते आये हैं वे शोषितों के अध्ययन के नाम पर शोषण की दमन की अपमान की कहानियों को प्रचारित करते हैं। 


भारत के सवर्ण द्विज साहित्यकारों को देखिये। वे दलितों ट्राइबल्स के शोषण और जातिवाद पर हजारों कहानियां कविताएं लिख देंगे लेकिन शोषक समाज की अपनी जाति व्यवस्था, उनके आपसी मतभेदों, छुआछूत, ऊंच नीच या संघर्षों पर कभी नहीं लिखेंगे।


वे समझदार हैं वे सिर्फ फंतासी लेखन करेंगे। नायिका विमर्श, नख शिख वर्णन, कृष्ण भक्ती, राम की शक्तिपूजा या ऐसा ही कुछ। शोषण की चिंता करते हुए भी शोषकों के बारे में नहीं लिखेंगे। वे इसलिए नहीं लिखेंगे कि शोषक समुदायों की पोल खुलने से दलित ओबीसी ट्राइबल समुदायों का ज्ञानवर्धन होगा।


जिसका ज्ञानवर्धन होता है वो जीतता है। ज्ञान ही शक्ति है। 


सौभाग्य से अभी ट्राइबल समुदाय में स्वयं ट्राईबल लेखकों में रुदन और विलाप की बीमारी ने अभी तक महामारी का रूप नहीं लिया है। ट्राइबल समाज के पास अपने धर्म, संस्कृति और वर्ल्ड व्यू के ओरिजिनल नेरेटिव्स जिंदा हैं। ट्राईबल समुदायों से बहुत उम्मीद की जा सकती है।


दलित ओबीसी को बहुत सावधानी से अपने पॉजिटिव नेरेटिव्स को उभारना होगा। विलाप और शोषण का विषय बनकर लिखने की बजाय सवर्णों द्विजों का ज्ञानवर्धन करने की बजाय अपने प्राचीन धर्मों, परम्पराओं, शास्त्रों के बारे में दलितों ओबीसी समुदायों के ज्ञानवर्धन हेतु लिखना होगा।


जिसके लिए लिखा जाता है उसे ही अंत मे फायदा होता है। इतिहास को गौर से देखिये, साहित्य और लेखन का इतिहास यही सिखाता है।

( फोटो – दिलीप डामोर )

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