चिदंबरम की गिरफ्तारी एक बड़ा राजनैतिक स्टंट है!

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-प्रेम कृष्ण शर्मा


वैसे मेरे मन में चिदम्बरम के लिये कोई हमदर्दी नहीं है और न यह कह रहा हूँ कि उनके द्वारा कोई भृष्ट कारनामा किये जाने की कोई सम्भावना ही नहीं है। 


चिदंबरम,सिद्धार्थ शंकर रे जैसे नामी वकील जो नेता भी रहे हैं मेरे विरुद्ध श्रमिक मामलों में बड़े पूजीपतियों की तरफ से श्रम न्यायालय व हाई कोर्ट में आते रहे हैं। 


यह विडंबना मेरी समझ में कभी नहीं आई कि सार्वजनिक जीवन में बड़ी बड़ी जनपक्षीय और मेहनतकशों के हित की बातें करने वाले राष्ट्रीय स्तर के नेता पैसों की खातिर कैसे एक शोषित और पीड़ित श्रमिक और उसके अदना से वकील के खिलाफ लड़ने के लिये आ जाते हैं।

वे जब भी आते फैक्ट्री मालिक की तरफ से मेरे पास सुबह ही फोन आ जाता कि वे सबसे पहले जज साहब से अपने केस की सुनवाई का निवेदन करेंगे, आप आ जाना।


पहली बार अकड़ में मैं नहीं गया तो जज ने सुबह ही उस केस की सुनवाई कर उनके पक्ष में स्टे दे दिया और आदेश में यह भी लिख दिया कि प्रतिद्वन्दी वकील फोन से सूचना देने के बाद भी नहीं आया। इसलिये आगे से उनके रुतबे को समझकर मुझे भी सावधान होना पड़ा।

यह ज़रूर था कि ईमानदारी से वे मुझे फोन कर देते थे। पर भला हो उस समय के सुप्रीम कोर्ट जजों का जिनके द्वारा श्रमिकों के पक्ष में दिये गये फैसले उन वकीलों के हर तर्क का जवाब होते थे जो उन्हें अक्सर सफल नहीं होने देते थे।


कोर्ट से बाहर आने के बाद वे एक महान सन्त के अंदाज़ में मुझे शाबाशी देते थे जिससे  मुझे और ज़्यादा चिढ होती थी। इसलिए उनके लिए कोई सहानुभूति तो हो ही नहीं सकती फिर भी मैं इस गिरफ्तारी को दुर्भावनापूर्ण मानता हूँ। 


यह भी हर कोई जानता है कि गिरफ्तार करवाने वाले भी कोई दूध के धुले नहीं हैं बल्कि कुछ ज़्यादा ही मैले हैं। जब जिसका मौका लग जाये। यह राम रावण युद्ध नहीं है ,बल्कि दाऊद और छोटा राजन के बीच होने वाली गैंगवार है।

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