बहुजनों में कल्चरल कैपिटल का अभाव है !

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(दिलीप मंडल )
आग का दरिया है ये. यहां आपकी सबसे बड़ी समस्या तो ये है कि आप चाहे अपने यूनिवर्सिटी के टॉपर हों. आपकी किताबें या चैप्टर ऑक्सफोर्ड में छपे हों, आप बेहतरीन लिखते हों, लेकिन आपका टाइटल ठीक नहीं है तो आपको बुद्धिजीवी नहीं माना जाएगा. 

कुमार और प्रसाद जैसे टाइटिल लिख कर आप छिप नहीं सकते. वे आपकी दुम उठाकर जांच लेते हैं.समस्या सिर्फ ये नहीं है कि वे आपको बुद्धिजीवी नहीं मानते. वे तो ऐसा करेंगे ही है. 

बड़ी दिक्कत ये है कि आपके लोग भी आपको बुद्धिजीवी नहीं मानेंगे. उनकी मानसिक ट्रेनिंग ही ऐसी नहीं है कि वे अपने को या अपने जैसे को बुद्धिजीवी मानें. जैसा कि बाबा साहेब ने AoC में लिखा है – भारत में ब्राह्मण ही बुद्धिजीवी माने जाते हैं.

बहुजनों को अपने बुद्धिजीवी होने का भरोसा नहीं है. कल्चरल कैपिटल का अभाव है.
चलिए, इसके बावजूद अगर आपने सोशल मीडिया में थोड़ी हैसियत बना ली तो ट्विटर-फेसबुक के भारत के दफ्तरों में बैठे लोग आपको आसानी से जीने नहीं देंगे. आपकी महीनों, वर्षों पुरानी पोस्ट निकाल कर आपको समय समय पर सस्पेंड और रिस्ट्रिक्ट करते रहेंगे.मतलब आपको हमेशा तलवार की धार पर संभल कर चलना है. 

जरूरी नहीं है कि किसी वाजिब वजह से ही आपका एकाउंट सस्पेंड होगा. ये उनकी मर्जी की बात है. बिना वजह उस पर केस भी हो सकता है.
 
वे आपको कभी वेरिफाइ नहीं करेंगे. आपका नाम प्रकाश आंबेडकर हो सकता है. आप भीम आर्मी के चीफ हो सकते हैं. आप प्रोफेसर विवेक कुमार हो सकते हैं. आप देश की सबसे नामी यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट हेड हो सकते हैं. आप वाइस चांसलर हो सकते हैं. राजस्थान के आदिवासी सांसद तक को वे वेरिफाइ नहीं कर रहे हैं.वे आपको वेरिफाई नहीं करेंगे. 

इसके बिना आपके लोग भी आपको रिट्विट और शेयर नहीं करते. यानी कि आप वेरिफाई हुए बिना असरदार नहीं बन सकते. वे आपको असरदार बनने नहीं देंगे. 

इसके बावजूद अगर कोई आदमी सोशल मीडिया में अपनी हैसियत बना पा रहा है, तो उसका आदर कीजिए. उसने आग का दरिया पार किया है. 

वह साधारण आदमी नहीं है.

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