बहुजन युवा लीडरशिप :दयनीय दशा और दिग्भ्रमित दिशा !

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( डॉ एम. एल. परिहार )

किसी लीडर व संगठन के बिना बहुजन युवाओं ने गये साल 2अप्रैल को पूरे देश में आक्रोश लेकिन अनुशासन के साथ अपने मानवीय हकों के लिए एक होकर आवाज उठाई थी. आज कोई संगठन या लीडर लाख कोशिश करें तो भी ऐसा वैचारिक जलजला पैदा करना मुश्किल है.आज बहुजन युवा एक चौराहे पर असहाय खड़ा बौद्धिक व प्रभावशाली लीडरशिप की तलाश में रौंदा जा रहा है.

पिछले कई दशकों से वह बुरी तरह ठगा जा रहा है. हर साल देश में राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र में एकाएक कोई युवा उभरता है तो सभी उसे अपना लीडर व मसीहा मानकर साथ हो जाते है उसी में आशा की किरण नजर आती हैं लेकिन थोड़े समय बाद लीडर के स्वार्थ, अहंकार, अतिमहत्वाकांक्षा व नेतृत्व गुणों की कमी के कारण वह नाकामयाब हो जाता है या विरोधी विचारधारा से समझौता कर लेता है. युवाओं के सपनों पर पानी फिर जाता है और यह सिलसिला आज भी जारी है. बहुजन युवा लीडरशिप की असफलता की मुख्य वजह है वैचारिक बौद्धिक परिपक्वता की कमी. अधिकतर को हमारे आदर्श बुद्ध कबीर रैदास फुले, बिरसा, बाबासाहेब के विचारधारा की न पूरी समझ होती हैं न सामाजिक ,आर्थिक, सांस्कृतिक सरोकारों की सोच. न देश दुनिया की जानकारियां होती है और न खुद का विजन.

हमारे युवा लीडर अच्छे वक्ता बनने की भी जरूरत नहीं समझते है. मीडिया के सामने बोलने का साहस भी नहीं जुटा पाते हैं और न ही अपने विचार ,व्यवहार व रहन सहन से प्रभावित कर पाते हैं. इसलिए स्थानीय परिस्थितियों से जिस तरह एकाएक उभरते है, उसी तरह सारे युवाओं के सपनों को चकनाचूर कर गुमनामी में खो जाते हैं.

हालांकि पूरा बहुजन समाज इन्हें अपनी लीडरशिप को प्रभावशाली बनाने का पूरा सहयोग व अवसर देता है. लेकिन अधिकतर जिस तेजी से उभरते है, उसी तेजी से गायब हो जाते हैं. शुरू में ये सभी बहुजनों में सामाजिक आर्थिक व वैचारिक  जाग्रति लाने का दावा करते हैं ;लेकिन कुछ ही समय बाद किसी राजनीतिक पार्टी की गोद में बैठ कर नए सपने देखने लगते हैं या खुद ही अपनी पार्टी बना कर समाज को दिल्ली की सल्तनत तक ले जाने का ठेका ले लेते हैं. यह बात और है कि पूरे देश में एक सरपंच भी नहीं जीता पाते हैं. इस तरह सामाजिक आर्थिक समस्याओं को दरकिनार कर राजनीतिक सत्ता का ख्बाब दिखा कर कई लीडर लंबे समय से बहुजन समाज का शोषण कर रहे हैं.

अभी पूरे राजस्थान में यूनिवर्सिटी व कॉलजों के छात्रसंघ चुनाव में कई जगह अनु.जाति जन जाति के उम्मीदवार जीते हैं खुशी की बात है बधाई देते हैं. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू विचार करने लायक हैं. कुछ सालों पहले भले ही बहुजन युवा छात्र कम जीत पाते थे, लेकिन उनमें वैचारिक व बौद्धिक परिपक्वता होती थी .हमारे आदर्श फुले बिरसा बाबासाहेब के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता थी जो आजकल नहीं के बराबर हैं.

जीतने के बाद महीनों तो छोड़ो कुछ दिन बाद ये कहीं भी चर्चा में नजर नहीं आते हैं.और यदि आते भी है तो अपनी विवादित टिप्पणियों व फैसलों के द्बारा. इन्हें भी अपनी लीडरशिप को लोकप्रिय बनाने का पूरा अवसर मिलता है, लेकिन अपने कार्यकाल में बहुजन विचारधारा को छोड़ विरोधी विचारधारा की गलियों में भटकते नजर आते हैं. इनकी जीत पर पूरा बहुजन समाज खुशी मनाता है लेकिन थोड़े ही दिनों बाद खुशी काफूर हो जाती है.

इन कॉलेजों से बीते कई सालों से कोई युवा समाज का लीडर नहीं बन पाया है उल्टा दिशाहीन राजनीति व अपने करियर को भूल जाने के कारण खुद संकट में फंस जाते हैं. युवा लीडरशिप की भारी कमी को देखते हुए समाज आशा करता है कि इन में से कोई छात्रनेता राज्य व देश में समाज व राजनीति का युवा चेहरा बन कर उभरे लेकिन निराशा ही मिलती है.

गौर करने वाली बात यह है कि अब सरकारी कॉलेजों में ज्यादातर बहुजन समाज के ही स्टूडेंट्स पढते हैं जो सिर्फ सरकारी नौकरी के लिए रटे रटाए कोर्सेज पढते है. बाकी सवर्ण समाज तो काफी जागरूक हो गया है वे छात्र राजनीति में उलझकर करियर खराब करने की बजाय अपनी अपनी जातियों की प्राइवेट कॉलजों में सीए,सीएस, फॉरेन लैंग्वेज, बिजनेस व रोजगार से जुड़े कोर्सेज पढते हैं. वणिक समुदाय तो अब कॉलेजों के चुनाव में कहीं भी उलझता नजर नहीं आता हैं. इसलिए सरकारी कॉलेजों में जब बहुजन ही ज्यादा पढतें है तो जितना बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन सामाजिक समीकरणों व एकता से जीत कर भी बहुजन समाज को दिशा देने जैसी लीडरशिप तैयार नहीं होती है यह विचारणीय हैं.         

देश की मौजूदा बहुजन युवा लीडरशिप में व्यवस्था के प्रति आक्रोश की बजाय व्यक्तिगत क्रोध है, बुद्धि की बजाय बल ज्यादा हावी हैं ,संवैधानिक ढंग से बौद्धिक स्तर पर आंदोलन की बजाय छोटी छोटी बातों पर बिना सोचे समझे भारत बंद, प्रदेश बंद की घोषणा कर पूरे बहुजन समाज को कानूनी मुश्किलों में फंसवा देता है.

बाबासाहेब ने भी कई आंदोलन किए थे लेकिन हिंसा, तोड फ़ोड़ व गुस्से से हमेशा दूर रहे क्योंकि उन्हें लंबी यात्रा पार कर शोषितों को मानवीय हक दिलाने थे. उन्होंने क्रोध,गाली गलौज व लट्ठ की बजाय तर्क ,विवेक, बुद्धि व कलम से बौद्धिक स्तर  पर विरोधियों से मुकाबला किया.आज युवा लीडर बाबासाहेब के संघर्ष के मार्ग से भटक जाने के कारण खुद भी कानूनी मुश्किलों में उलझे रहते हैं और समाज को भी झोंक देते हैं.

आज देश का सामाजिक आर्थिक राजनीतिक परिदृश्य काफी बदल गया है . बहुजनों के बुनियादी मुद्दों की बजाय धार्मिक उन्माद व जातिवादी मानसिकता ज्यादा हावी है इसलिए बहुजन युवाओं को बहुत सोच विचार कर कदम रखने होंगे.बुद्ध, कबीर, रैदास, फुले, बिरसा, बाबासाहेब की विचारधारा पर चलते हुए संवैधानिक ढंग से बौद्धिक स्तर पर संघर्ष से ही सफलता हासिल हो सकती हैं.

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