एक अभिनव पहल – ‘सांगानेर स्टडी सर्किल’ का ‘अपना पुस्तकालय’

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यह प्रेरक कहानी राजस्थान के भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से आती है,जहाँ नगर परिषद की सीमा में बसा हुआ है,उप नगर सांगानेर।एक प्राचीन किला जिसकी चार बुर्जे है,यहां आज भी खड़ा है,ऐतिहासिक कस्बा है सांगानेर ,लेकिन इतिहास क्या है,ज्यादा जानकारी नहीं है,इधर से जब भी गुजरता रहा ,समाजवादी नेता  मनोहर लाल मेहता के नाम पर बने एक विद्यालय के प्रवेश द्वार को जरूर देखता रहा हूँ। मेहता जी किसी जमाने मे विधायक रहे थे,उनके सोशल रिफॉर्म के कामों के बारे में बहुत सुना था,कनोडिया कॉलेज में राजनीति शास्त्र की प्राध्यापक रही मेहता जी की निर्भीक बेटी डॉ रेणुका पामेचा से ।


ख़ैर, इस बार सांगानेर से परिचय दूसरी तरह से हो रहा था,पास पड़ोस के जिलों के दोस्तों की जुबानी कुछ बातें रिस रही थी कि सांगानेर के 15-20 ज़ुनूनी युवा नदी की धार में उतर गये हैं और लगे हैं नदी को साफ करने।


अज़ीब सा लगा ,समूह का नाम तो बड़ा साहित्यिक सा, उससे जुड़े अधिकांश लोग भी लिखने,पढ़ने अथवा पढ़ाने वाले लोग, फिर यह कोठारी नदी के कचरे में कैसे धंस गये,यह क्या सूझी इन भले मानुषों को ?तो कुछ इसी तरह के वैचारिक द्वंद्व से दो चार होते हुए मैंने ‘सांगानेर स्टडी सर्किल’के बारे में जानना,समझना शुरू किया,जल्द ही मीडिया की सुर्खियों में स्टडी सर्कल था,पढ़ने लिखने की वजह से नहीं,फिर से नदी सफाई अभियान की वजह से ही।


लोग आश्चर्यचकित थे कि यह अचानक युवाओं को हो क्या गया है ? बिना किसी मशीनों और प्रशासनिक मशीनरी के खुद गंदगी में उतर कर कोठारी नदी को स्वच्छ करने की मुहिम को मुकाम तक पहुंचाने की ज़िद किये हुए थे,ये युवा। 


कोठारी नदी जिस पर मेजा बांध बंधा हुआ है,जी हां,वही मेजा डैम जिसने दशकों तक भीलवाड़ा शहर के लाखों बाशिंदों और पर्यटकों व प्रवासियों की प्यास बुझाई है,इसी नदी की छाती पर बीसलपुर भी खड़ा है,बहुतेरे और भी अवरोधक है,जो इस नदी की जीवंतता और निरंतरता को बाधित किये देते हैं।


कोठारी जो इस क्षेत्र की जीवन रेखा रही है,जो कभी अविरल बहती रही है,वह सदानीरा सीजनल नदी बनी और शनै शनै रेत की धार मात्र बन कर रह गई, फिर उस रेती पर भी बजरी माफिया की नजर पड़ गई और उन धन पिपासुओं ने जगह जगह से कोठारी की कोख को नोंच डाला,ज्यादती तो कोठारी के साथ उद्योगपति नामक जंतुओं ने भी कम न की,प्रोसेस हाउसों का जहरीला केमिक्लाइज्ड पानी छोड़ दिया।


फिर भूमाफिया कैसे पीछे रहते ,उन्होंने पूरी निर्ममता से नदी के दोनों तरफ सीमेंट कंक्रीट का जंगल उगा दिया,आखिर किसे फिक्र थी एक नदी की,हर कोई उसके साथ जोर जबर्दस्ती पर उतारू था,पर अचानक उस नदी की सुध लेने कुछ धरतीपुत्र स्वतःस्फूर्त भाव से कूद पड़े,उतर गए नदी की धार को अविरल करने के लिए,उसके पानी को स्वच्छता देने के लिए।


सांगानेर स्टडी सर्किल के संयोजक आदित्य देव वैष्णव जो कि भूगोल के व्याख्याता है,वे बताते हैं कि हम कुछ लोग 2010 से ही यदा कदा कोठारी को साफ करते रहें है,पर वे सभी व्यक्तिगत प्रयास थे,इस बार का प्रयास संगठित ,नियोजित व सामूहिक था। बाकायदा उसका एक नाम था और सोशल मीडिया पर उसकी गतिविधियों की धमक थी।


इस तरह सांगानेर स्टडी सर्किल ने पर्यावरणीय चिंताओं,नदी नालों,जल स्त्रोतों के प्रति आम जन को जागरूक करने व उनका सरोकार बनाने के लिए अभियान छेड़ा जो बहुत आगे गया,जिसको व्यापक सराहना मिली,मीडिया,प्रशासन, सिविल सोसायटी ,चित्रकार,कवि,रंगकर्मी,व्यापारी,मजदूर,किसान,विद्यार्थी,शिक्षक हर कोई इस अभियान से जुड़ गये।


मेरा परिचय इस अभियान से माण्डलगढ़ कॉलेज के व्याख्याता सूरज पारीक और साहित्यकार व शिक्षक माणिक जी के ज़रिए हुआ,मीडिया व सोशल मीडिया का योगदान भी इसमें कम न रहा।
जब जाना तो उत्सुकता व उम्मीदें दोनों ही बढ़ गये, मन मस्तिष्क पर सांगानेर स्टडी सर्कल छाए रहा, वहां जाने और साथियों से मिलने की इच्छा अदम्य होती गयी,पर मुनासिब मौका ही मय्यसर न हुआ,फिर अचानक 3 अगस्त 19 की शाम ट्रैवलर फूडी व ब्लॉगर कमल रामवानी सारांश के सद्प्रयासों से यह विजिट संभव हो ही गया।


जाना इसलिए भी बेहद जरूरी हो गया था,क्योंकि सांगानेर स्टडी सर्किल अपनी मूल विधा की तरफ अग्रसर हो चुका था,सर्कल ने अपना दायरा बढ़ाते हुए राजकीय विद्यालय में एक लाइब्रेरी शुरू कर दी ,जिसे नाम मिला-‘अपना पुस्तकालय’जब पुस्तकालय अपना हो और लोग भी अपने ही,तो फिर परायापन कैसा,सो हम भी कुछ किताबें लेकर जा धमके सांगानेर।


पुस्तकालय में आदित्य देव वैष्णव, सूरज पारीक,विशाल भाई व अन्य कुछ लोग मौजूद थे,एक बड़े कमरे में बहुत ही सुरुचिपूर्ण ढंग से सुसज्जित पुस्तकालय ! तकरीबन 600 किताबों की उपलब्धता ,नियमित पाठकों का आगमन ,दीवारों पर बुद्ध,विवेकानंद, आइंस्टीन, मदर टेरेसा के कोटेशन,उनके चित्र,सांगानेर स्टडी सर्कल का परिचय कराता एक बोर्ड,फोटोग्राफ्स,विजिटर्स के वक्तव्य,देश विदेश के बहुत सारे महापुरुषों व महास्त्रियों के नयनाभिराम चित्रों की प्रदर्शनी।


आरामदायक आसन्दियाँ,साफ सुथरी मेजें और उन पर रखी किताबों को पढ़ते हुए युवा,बाल ,प्रौढ़ व वृद्धजन। महिलाओं की भागीदारी जरूर होगी पर उस वक्त न थी,हर वय के पुर्लिंग वहां मौजूद थे।
मैं पूछता हूँ -‘क्या पढ़ा जा रहा है लोगों द्वारा ?’ विशाल ने जवाब दिया -सर ,बच्चे कॉमिक्स,अमर चित्र कथाएं व बाल साहित्य पढ़ते है,बुजुर्ग आध्यात्मिक किताबें और युवा कॉम्पिटिशन की तैयारी वाली पुस्तकें पढ़ते हैं। हालांकि पढ़ने के लिए हर प्रकार का साहित्य यहां सहेजा गया है।


फिक्शन,नोनफिक्शन,मोटिवेशनल,कविता,कहानी,विज्ञान,आध्यात्म,विचार आदि सब तरह की किताबें लाई गई है,चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट व नेशनल बुक ट्रस्ट की किताबें तो हैं ही , देश भर के कईं प्रकाशकों की किताबें भी लंबी दूरियाँ तय करके यहाँ तक पहुंच चुकी है।


हमारा काफी सारा वक्त तो कुछ सैद्धांतिक विमर्श में ज़ाया हुआ,लेकिन लौट कर हम अपना पुस्तकालय पर ही आये,फिजिकल वेरिफिकेशन भी किया,अलमारियां खोली गई और अंगुलियों से किताबों को छू कर महसूस किया गया,छपे हुए पन्नों की खुशबू को भी भीतर तक खींचा गया ,इसी दौरान बहुत से फ़ोटो भी कमल जी ने खिंचे।


फोटुओं की खींचाखींचीं और वैचारिक खींचतान  से फुर्सत मिली तो कबीरद्वारा गुरुकुल पहुंचकर योगेश भाई के आलुबड़े व कचौरी का भरपेट स्वाद लिया गया,400 साल पुराने कबीरद्वारा का भी अवलोकन किया ,यह आदित्य जी का निवास भी है,इसलिए तरोताज़ा करने वाली चाय भी यहाँ नसीब हो गई ।


तकरीबन 2 घण्टे के विचार विमर्श के बाद मैंने और कमल रामवानी जी ने साथियों स्व विदा तो ली,पर मन वहीं रह गया,क्योंकि बहुत कुछ जानना तो शेष ही रह गया था ।


इस बार तो सांगानेर गांव,सांगानेर स्टडी सर्किल और अपना पुस्तकालय के बारे में बहुत ऊपरी ऊपरी परिचय हो पाया,यूं कह लीजिए कि हम कोठारी के किनारों से ही लौट आये,अगली बार उसमें उतरेंगे और खुद से जानेंगे,समझेंगे…!


-भंवर मेघवंशी

(संपादक – शून्यकाल डॉटकॉम)

फ़ोटो क्रेडिट – कमल रामवानी सारांश

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