डॉ.अंबेडकर को समझने के लिए एक जरुरी पुस्तक

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( इन्द्रेश मैखुरी )
पीछे मुड़ कर देखना एक जरूरी काम है. लेकिन राजनीति में पीछे मुड़ के देखने के दो नजरिए हैं. प्रतिगामी विचार के वाहक अतीत में ही जीते हैं और तमाम आधुनिक संसाधनों का लाभ उठाते हुए,वैचारिक स्तर पर समाज को पीछे ही ले जाना चाहते हैं. इसके बरक्स जो प्रगतिशील हिस्सा है,सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का आकांक्षी हिस्सा है,वह आगे का रास्ता तलाशने के लिए ही पीछे मुड़ कर देखता है. इसी नजरिए से अतीत के नायकों को याद करता है,उन्हें वर्तमान और भविष्य की प्रासंगिकता की कसौटी पर कसता है. डा.बी.आर.अंबेडकर एक ऐसे विचारक, राजनेता, एक्टिविस्ट, नीति निर्माता हैं,जिनकी आज के समय में पुनः बड़े जोरशोर से चर्चा हो रही है. लेकिन इस चर्चा के बीच, विचारों के बजाय नायक हथियाने की होड़, एक हिस्से में ज्यादा दिखाई देती है. किसी भी नायक का मूल्यांकन और प्रासंगिकता,उसके विचारों के आईने में ही स्पष्ट हो सकती है. डा. अंबेडकर को समझने के लिए तो यह और भी जरूरी है कि उनके विचारों की रौशनी में उन्हें जाना-समझा जाये क्यूंकि उन्हें एक खास खांचे में ही देखने की प्रवृत्ति देश में आम तौर पर मौजूद है.

विचारों के आईने में डा. अंबेडकर को समझने की दिशा में कोशिश करती एक पुस्तक का नाम है – “डा.अंबेडकर : चिंतन के बुनियादी सरोकार.” इस पुस्तक के लेखक हैं-डा. रामायण राम,जो पेशे से प्राध्यापक हैं और जन संस्कृति मंच,उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव हैं. डा. अंबेडकर को उनके विचारों की रौशनी पर बल देते हुए भूमिका में लेखक कहता है कि “….डा अंबेडकर की इस लोकप्रियता और चुनावी राजनीति की विवशता से निकली सर्वप्रियता ही उनके मूल विचारों और संदेशों पर पर्दा डाल देती है. वर्चस्व की राजनीति करने वालों के लिए यह ज्यादा सुविधाजनक है कि डा. अंबेडकर की पहचान एक दलित नेता के रूप में हो. उनके चिंतन के व्यापक आयाम आम लोगों तक न पहुँचें,यह स्थिति तथाकथित अंबेडकरवादी व दलित बहुजन आधार पर राजनीति करने वालों के भी अनुकूल है. इनके लिए डा.अंबेडकर के मूल विचारों से ज्यादा उनकी लोकप्रियता काम की चीज है……… लिहाजा डा.अंबेडकर के मूल सरोकारों की उपेक्षा की गयी और उनके विचारों के प्रति एक साजिशपूर्ण चुप्पी अख़्तियार की गयी. यही वजह है कि लंबे समय तक डा. अंबेडकर की प्रासंगिकता पर खुल कर चर्चा नहीं हुई.” वर्तमान समय में डा. अंबेडकर की प्रासंगिकता पर चर्चा की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए डा. रामायण राम भूमिका में लिखते हैं कि “अब जब भारत का लोकतन्त्र अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है तो डा.अंबेडकर की याद आना स्वाभाविक है.आज भारतीय समाज,राजनीति और लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर जिस तरह का गंभीर संकट आसन्न है,ऐसे दौर में लोकतन्त्र और भारतीय संविधान के प्रखर शिल्पी के विचारों का संधान हमारे समय की जरूरत बन जाता है.”पुस्तक के पहले अध्याय में लेखक ने डा.अंबेडकर द्वारा लिखित “राज्य और अल्पसंख्यक” नामक दस्तावेज़ पर चर्चा की है. आम तौर पर डा.अंबेडकर को भारतीय संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के तौर पर संविधान निर्माता की पदवी से नवाजे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है. लेखक ने उक्त दस्तावेज़ के संदर्भ में उचित ही टिप्पणी की है कि भारतीय संविधान में डा. अंबेडकर के विचारों के अनुरूप क्या नहीं है,इसे जानने के लिए उक्त दस्तावेज़ को पढ़ा जाना चाहिए. राज्य और अल्पसंख्यक भारत की संविधान निर्मात्री सभा को अनुसूचित जाति-जनजाति परिसंघ को सौंपा गया ज्ञापन है,जिसे डा.अंबेडकर ने लिखा था. यह दस्तावेज़,संविधान के प्रारूप में ही लिखा गया था. इसका सबसे रैडिकल भाग वह है,जिसमें उद्योगों के राष्ट्रीयकरण और कृषि को राजकीय उद्योग घोषित करने की वकालत की गयी है. डा. रामायण राम लिखते हैं कि “यदि भारतीय राष्ट्र राज्य खुद को इन सिद्धांतों को लागू करने में समर्थ पाता तो यह यह न सिर्फ भारत बल्कि समूची दुनिया के जनतांत्रिक इतिहास की सर्वाधिक कारांतिकारी घटना होती,लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.” ऐसा नहीं हुआ और इसलिए देश का आमजन निजी पूंजी के शिकंजे में फंसा हुआ है. पुस्तक के अगले अध्याय का शीर्षक है “भारत में स्त्री मुक्ति और डा.अंबेडकर.” इस अध्याय में पितृसत्ता के मकड़जाल में स्त्रियॉं के फंसे होने के संदर्भ में डा. अंबेडकर के अध्ययनों की तफसील से विवेचना है. डा. अंबेडकर ने लिखा कि बौद्ध धर्म से निपटने के लिए ब्राह्मणवाद ने जाति की बन्दिशें खड़ी की और साथ ही स्त्रियों के लिए भी कई सारी पाबन्दियाँ ईजाद की. इन पाबंदियों को मनु स्मृति में संहिताबद्ध कर दिया गया. डा. अंबेडकर बौद्ध धर्म की क्रांति के विरुद्ध ब्राह्मणवाद की प्रतिक्रांति करार देते हैं और मनु स्मृति को स्वीकार किए जाने को इस प्रतिक्रांति की परिणति बताते हैं. इस अध्याय के अंतिम भाग में हिन्दू कोड बिल का उल्लेख है. महिलाओं को संपत्ति में उत्तराधिकार,तलाक और विधवा विवाह जैसे अधिकारों का प्रावधान हिन्दू कोड बिल में था.लेकिन इसको लेकर उस समय संसद के अंदर और बाहर डा.अंबेडकर का पुरजोर विरोध हुआ. हिंदूवादियों ने तो डा.अंबेडकर पर आरोप लगाया कि इस बिल के जरिये वे हिन्दू धर्म के सभी खंबे ध्वस्त कर देना चाहते हैं. अंततः इस बिल को पारित न कराये जाने से क्षुब्द हो कर डा.अंबेडकर ने नेहरू मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया. डा. रामायण राम लिखते हैं कि भारत में जाति उन्मूलन और नारी मुक्ति एक सहधर्मी लड़ाई है. वर्तमान दौर में राजनीति में सर्वाधिक चर्चित शब्दों में से एक है राष्ट्रवाद. इस पुस्तक के तीसरे अध्याय में राष्ट्रवाद के संदर्भ में डा.अंबेडकर के विचारों की विवेचना की गयी है. डा.अंबेडकर राष्ट्र निर्माण के लिए स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व को आवश्यक मानते थे. वे मानते थे कि बिना जाति उन्मूलन के राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है. उक्त अध्याय में डा. अंबेडकर के उद्धरण से उनकी इस बात को समझ सकते हैं,जिसमें वे कहते हैं कि “… आप समाज को रक्षा या अपराध के लिए प्रेरित कर सकते हैं. लेकिन जाति व्यवस्था की नींव पर आप कोई निर्माण नहीं कर सकते ; आप राष्ट्र का निर्माण नहीं कर. जाति व्यवस्था की नींव पर आप कोई भी निर्माण करेंगे,वह चटक जाएगा और कभी भी पूरा नहीं होगा.” संविधान सभा की बहस में भी उन्होंने जातियों को राष्ट्रविरोधी करार दिया था. उपरोक्त के आलोक में आज के उन्मादी राष्ट्रवाद की असलियत की शिनाख्त की जा सकती है. आजादी के बाद भारत एक धर्मनिरपेक्ष,लोकतांत्रिक देश बना. लेकिन इसे हिन्दू राष्ट्र बनाए जाने का स्वर जब-तब सुनाई देता रहा और वर्तमान में तो इसका शोर सबसे तेज है.डा. अंबेडकर को भी हिन्दुत्व के खांचे में फिट करने की कोशिशों तेज कर दी गयी हैं. लेकिन अंबेडकर के विचारों से जैसे ही आप गुजरते हैं तो पाते हैं कि  हिंदुकरण करके उन्हें हजम करना नामुमकिन है. इसकी विवेचना उक्त पुस्तक के चौथे अध्याय में की गयी है,जिसका शीर्षक है- “हिन्दुत्व,हिन्दू राष्ट्र और डा.अंबेडकर.” डा.अंबेडकर द्वारा लिखित “पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन”,के हवाले से जो बातें कही गयी हैं,वे इस बात को साफ करती हैं कि हिन्दू राष्ट्र को अंबेडकर इस देश के लिए एक घातक परियोजना समझते थे. लेखक ने लिखा है कि पाकिस्तान के निर्माण को अंबेडकर ने ‘राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय’ के अधिकार के तहत समझा था,लेकिन वे धर्म के नाम पर बनने वाले राष्ट्र के समर्थक नहीं थे.  हिन्दू राष्ट्र के संदर्भ में तो अंबेडकर ने स्पष्ट ही कहा कि “अगर वास्तव में हिन्दू राज बन जाता है तो निस्संदेह इस देश के लिए भारी खतरा उत्पन्न हो जाएगा….. प्रजातंत्र के लिए यह अनुपयुक्त है. हिन्दू राज को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए.” इस अध्याय का समाहार करते हुए डा.रामायण राम लिखते हैं कि आज डा.अंबेडकर की चेतावनियों को याद करना और बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के उन्माद को रोकना भारतीय लोकतन्त्र का एक मौलिक कार्यभार बन गया है.       डा.अंबेडकर ने अपना पूरा जीवन जाति उन्मूलन के काम पर लगाया.इस पुस्तक का पांचवां  अध्याय डा.अंबेडकर के जाति और जाति उन्मूलन संबंधी चिंतन पर केन्द्रित है. इस अध्याय में बेहद विस्तार से जाति की उत्पत्ति की शिनाख्त करने और उसके उन्मूलन के लिए किए गए डा.अंबेडकर के अध्ययनों और कार्यों का ब्यौरा है. वे बेहद गहराई से जाति की उत्पत्ति के कारणों और कारकों की खोज करते हैं,इसके लिए व्यापक अध्ययन में जाते हैं और फिर जाति के उन्मूलन की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं. लेकिन ऐसा करते हुए भी वे अपनी धारणाओं को लेकर अड़ियल नहीं होते,बल्कि एक शोध कर्ता की तरह वैज्ञानिक तरीके से अपने निष्कर्षों को देखते हैं और नए निष्कर्षों के सामने आने पर सहर्ष ही पुराने निष्कर्षों को तिलांजलि देने को भी तैयार रहते हैं. वे कहते हैं, “……मैंने जाति प्रथा के बारे में एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया.यदि यह आधारहीन लगेगा तो मैं इसे तिलांजलि दे दूंगा.” डा. रामायण लिखते हैं कि “डा.अंबेडकर ने अपने समय में जाति को समझने तथा उसका उन्मूलन करने की दिशा में अपना बहुमूल्य योगदान दिया. अब यह हम पर है कि हम उनके कार्यों को आगे बढ़ाएँ और एक सच्चे आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के लिए जाति उन्मूलन को अंजाम तक पहुंचाएँ.” पुस्तक के अंतिम अध्याय में वर्तमान सत्ता और उसके मातृ संगठन द्वारा डा.अंबेडकर को अपने में समाहित करने और इसके लिए उनके विचारों को विरूपित करने की कोशिशों का जिक्र है. लेखक आह्वान करता है कि वैचारिक रूप से विरूपित करके डा.अंबेडकर को हड़पने की कोशिशों को अंबेडकरवादी और परिवर्तनकामी लोग कामयाब न होने दें. नवारुण प्रकाशन द्वारा आकर्षक कलेवर और सुंदर छपाई वाली इस पुस्तक के जन संस्करण का मूल्य अस्सी रुपया है और पुस्तकालय संस्करण का मूल्य दो सौ रुपया है. डा.अंबेडकर को उनकी रचनाओं के माध्यम से जानने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए यह पुस्तक उपयोगी है.यह डा.अंबेडकर के चिंतन और सरोकारों का एक मोटा खाका सामने रख देते है,जिससे आगे बढ़ते हुए गहरे अध्ययन की दिशा में प्रवृत्त हुआ जा सकता है.
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पुस्तक -डॉ अंबेडकर :चिंतन के बुनियादी सरोकारलेखक – डॉ रामायन रामप्रकाशक – नवारुण प्रकाशन              सी-303 ,जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-9            वसुंधरा, गाजियाबाद-201012  मोबाइल/व्हाट्स ऐप -9811577426          ईमेल-navarun.publication@gmail.com)

( इन्द्रेश मैखुरी द्वारा डॉ. रामायण राम की पुस्तक-“डॉ अंबेडकर : चिंतन के बुनियादी सरोकार”,की मासिक पत्रिका युगवाणी के अक्टूबर 2019 अंक में प्रकाशित समीक्षा)

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