अम्बेडकर के अंतिम संदेश: बुद्ध, धम्म और भूमि के लिए संघर्ष करो।

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(प्रवीण कुमार अवर्ण )
बाबा साहब अम्बेडकर को लेकर यह आम धारणा है कि उन्होंने संसद की तरफ इशारा किया है। परन्तु बाबा साहब अम्बेडकर के जीवन के अंतिम चरण को अगर ध्यान से देखें तो पाएंगे कि उन्होंने सामाजिक एकता की ओर इशारा किया है और उस सामाजिक  एकता को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने अपने 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म को अपनाया तथा पूरे दलित समुदाय को बौद्ध धम्म अपनाना चाहिए यह साफ शब्दों में कहा। 

 राजनीतिक आंदोलन की सीमाएं
बाबा साहब अम्बेडकर अपने राजनीतिक अनुभव से यह अच्छी तरह समझ चुके थे कि राजनीतिक व्यवस्था दलितों के लिए लाभदायक साबित नहीं हो सकती, क्योंकि दलित समुदाय सामाजिक तौर पर कमजोर व असंगठित है।

यह बात यहां से साबित होती है कि बाबा साहब अम्बेडकर को पूना पैक्ट पर न चाहते हुए भी हस्ताक्षर करने पड़े।इस पैक्ट के बाद बाबा साहब ने माना कि राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था से दलित नेतृत्व नहीं बल्कि दलित समुदाय के दलाल ही पैदा होंगे। एक बात का स्मरण करना यहां जरूरी है कि बाबा साहब अम्बेडकर कभी भी राजनीतिक आरक्षण के पक्षधर नहीं रहे। बाबा साहब अम्बेडकर इस राजनीतिक व्यवस्था में चुनाव तक नहीं जीत सके तथा बाबा साहब अम्बेडकर हिन्दू कोड बिल भी संसद में पारित नहीं करवा पाए।

यह सब जो राजनीतिक असफलता थी इसका बस एक ही कारण था कि दलित समुदाय सामाजिक तौर पर संगठित और मजबूत नहीं था, नहीं तो शायद पूना पैक्ट न होता और अगर पूना पैक्ट न होता ,तो आज  मजबूत दलित नेतृत्व होता जो अपनी अपनी पार्टियों के साथ न खड़ा होकर दलित समुदाय के साथ खड़ा होता। 

पिछले सत्तर वर्षों से दलित समुदाय की  राजनीतिक असफलता लगातार जारी है । इसका एक ताजा उदाहरण यह है जब वर्ष 2018 में अजा जजा अत्याचार निवारण कानून को मौजूदा केन्द्रीय सरकार द्वारा कमजोर किया गया तो  कोई भी दलित सासंद जो आरक्षित सीटों से जीतकर आते हैं , नहीं बोला। ये सब दलित सांसद अपनी अपनी पार्टीयों के साथ खड़े थे न कि दलित समुदाय के साथ। परन्तु 2 अप्रैल 2018 को पूरा दलित समुदाय सड़कों पर उतरा , लगभग 13 नौजवानों की शहादत हुई और तब कहीं जाकर इस एक्ट को सरकार ने मूल रूप से फिर वापस लागू किया ।

यह पहला दलित समुदाय का इस तरह का शक्ति प्रदर्शन था, जिसके आगे सरकार को भी झुकना पड़ा। सबसे बड़ी बात जो इस प्रदर्शन की खासियत थी कि इसमें कोई नेता नहीं था यह सिर्फ दलित समुदाय की सामाजिक एकता का कमाल था। शायद  बाबा साहब अम्बेडकर यही कहना चाहते थे कि इस राजनीतिक असफलता का एक ही हल हो सकता है कि  दलित समुदाय अपनी सामाजिक एकता को कायम करते हुए , अपने अधिकारों की लड़ाई को लड़े ।

इसी सामाजिक एकता की प्रक्रिया के दौरान और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुएही दलित समुदाय अपने सच्चे नेतृत्व का निर्माण कर सकता है।जो राजनीतिक तौर पर परिपक्व हो और त्याग तथा बलिदान की भावना के साथ दलित समुदाय को संघर्ष के लिएतैयार कर सके।

इसलिए दलित समुदाय को जातिविहीन , संगठित और मजबूत बनाने के लिए बाबा
साहब अम्बेडकर ने बुद्ध के धम्म को चुना। यह सिर्फ एक धार्मिक आंदोलन नहीं था बल्कि सामाजिक धार्मिक आंदोलन था । जो दलित आंदोलन को आगे बढ़ने के लिए एक मजबूत आधार मुहैया करवाता। परन्तु बाबा साहब अम्बेडकर को ज्यादा समय  नहीं मिला और और बाबा साहब अम्बेडकर के बाद दलित नेतृत्व ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्हें तो संसद ही ज्यादा प्रिय लगा।

दलित समुदाय के आर्थिक मुद्दे।
दूसरा इशारा उन्होंने अपने अंतिम राजनीतिक भाषण में किया, जो उन्होंने 18 मार्च 1956 को आगरा में दिया। इस राजनीतिक भाषण में बाबा साहब अम्बेडकर ने दलित समुदाय के नेताओं को, जनता को, नौजवानों को, सरकारी कर्मचारियों को , भूमिहीन दलित मजदूरों को अलग अलग संबोधित किया।

इसमें बाबा साहब अम्बेडकर ने  मुख्य तौर पर दलित भूमिहीन किसानों और ग्रामीण आबादी को सम्बोधित करते हुए कहा कि दलित समुदाय की ग्रामीण आबादी इसलिए ज्यादा शोषित व पीड़ित है क्योंकि इन लोगों के पास जमीन नहीं है।  इन लोगों को दूसरों की जमीन के उपर काम करना पड़ता है और जीवन जापन के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

बाबा साहब ने कहा कि मैं इन लोगों के लिए जमीन की लड़ाई लड़ूंगा । तो इस तरह अपने दूसरे इशारे में बाबा साहब अम्बेडकर ने दलित आंदोलन का ध्यान दलित समुदाय के आर्थिक मुद्दों की तरफ खींचा।  दलित आंदोलन की सबसे बड़ी समस्या है कि दलित आंदोलन सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक , राजनीतिक न्याय की बात तो करता है परन्तु दलित समुदाय के आर्थिक मुद्दों को लेकर रणनीतिहीन है।

यह बहुत अहम बात है कि जब तक आप आर्थिक न्याय की बात नहीं करेंगे तो बाकी न्याय की लड़ाई अधूरी सी लगती है। अपने अंतिम राजनीतिक भाषण में जब बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा कि-“मैं भूमिहीन दलित किसानों की लड़ाई लड़ूंगा और उन्हें जमीन दिलवाने के लिए हर संभव कोशिश करूंगा “।

इस वाक्य से साफ समझा जा सकता है कि बाबा साहब अम्बेडकर  दलित समुदाय के आर्थिक मुद्दों को भी दलित आंदोलन के साथ जोड़ना चाहते थे। परन्तु बाबा साहब के पहले इशारे की तरह , दलित नेतृत्व ने इस ओर भी कोई ध्यान नहीं दिया और उल्टा अगर किसी ने आर्थिक मुद्दों पर चर्चा भी करनी चाही तो बड़ी आसानी से उसको वामपंथी कहकर एक तरफ कर दिया।

बौद्ध धम्म ही क्यों? 
बौद्ध धम्म एक सामाजिक सरोकार रखने वाला धर्म है। बौद्ध धम्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के जीवन पर अगर आप नज़र डालें तथा सिद्धार्थ से बुद्ध बनने तक की पूरी प्रक्रिया की ध्यानपूर्वक जांच करें तो पाएंगे कि सिद्धार्थ आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नर्क, मरने के बाद जीवन इत्यादि की खोज करने के लिए घर से नहीं निकले थे बल्कि समाज में व्याप्त दुःख, क्लेश, लड़ाई, झगड़े, असंतोष के कारणों की खोज तथा हल ढूंढने के लिए निकले थे और बुद्ध बन जाने के बाद उन्होंने समाज को दुखों, तकलीफों से मुक्ति पाने का मार्ग भी दिखाया।

बाबा साहब अम्बेडकर ने अपने लेख ,धर्मान्तरण क्यों? में बड़ी विस्तारपूर्वक समझाया है कि बौद्ध धम्म ही क्यों अपनाना चाहिए।यह धम्म इंसान को तर्कशीलता, समता, समानता और भ्रातृत्व का पाठ पढ़ाता है। इंसान को प्रगति , उन्नति करने के लिए खुला वातावरण चाहिए जो उसे एक तर्कशील और मजबूत इच्छाशक्ति वाला व्यक्ति बनाए।इन सब जरूरतों को पूरा करने के लिए एक ऐसा समाज चाहिए जो  तर्कशील, समता , समानता जैसे मूल्यों पर आधारित हो और इन मूल्यों की इज्जत करता हो।यह इंसान के लिए भी जरूरी है और समाज के लिए भी।

बौद्ध धम्म इन सब जरूरतों को पूरा कर सकता है।हालांकि बौद्ध धम्म में भी बहुत सी भ्रांतियां अब तक आ चुकी होंगी सम्भव है परन्तु आप अगर बौद्ध धम्म को ध्यानपूर्वक समझने और परखने की कोशिश करें तो काफी हद तक इन भ्रांतियों को दूर किया जा सकता है, परन्तु यह कतई नहीं समझना चाहिए कि बौद्ध धम्म में जाते ही सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।

बौद्ध धम्म सामाजिक एकता का आधार हो सकता है।इस सामाजिक शक्ति को आधार बनाकर दलित समुदाय को अपने अधिकारों को लड़ाई लड़नी होगी और अहम बात यह है कि लड़ाई हर मोर्चे पर होनी चाहिए फिर चाहे वो  सामाजिक हो, आर्थिक हो , सांस्कृतिक हो या राजनीतिक हो।जब तक इस देश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित नहीं हो जाता जो सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर सबको समानता दे,तब तक संघर्ष जारी रहेगा।

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