अद्भुत है भीलवाड़ा का घुमन्तू स्कूल !

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  भीख नही, क़िताब दो – साक्षरता अभियान


राजस्थान के भीलवाड़ा जिला मुख्यालय के पंचवटी इलाके के घुमन्तू बच्चों के मध्य कुछ ज़ुनूनी युवजन बहुत सराहनीय काम कर रहे हैं। वे अपने अपने काम करते हुए समय निकाल कर एक स्कूल चला रहे हैं ,जो हाशिये के वंचित तबकों के बच्चों के भीतर शिक्षा की भूख जगा रहे हैं।


स्वच्छ भारत अभियान और पर्यावरण संरक्षण ,नशा मुक्ति तथा जरूरतमंदों की मदद के लिए निरन्तर कुछ न कुछ करते रहने वाले ये उत्साही जन है -जया बामनिया,वंदना लुधानी,आशीष प्रजापत,साकेत गगरानी,काजल लुधानी व संतोष चंदेल आदि ।इनके अलावा भी कईं अन्य साथी भी है ,जो समय मिलने पर जुड़ जाते हैं और बिना ज्यादा प्रचार प्रसार के सामाजिक कार्यों में जुटे रहते हैं।


इन लोगों की खासियत यह है कि इनके लिए समाज सेवा प्रोफेशन नहीं है,न ही किसी एनजीओ का यह प्रोजेक्ट है।इसमें कार्यरत संतोष चंदेल अरिहंत हॉस्पिटल में कार्यरत हैं,जया बामनिया गृहिणी होने के साथ साथ सक्रिय समाजकर्मी हैं।वंदना लुधानी निजी कॉलेज में व्याख्याता है तो साकेत गगरानी का निजी कारोबार है,आशीष प्रजापत सिक्योर नामक कंपनी में कार्यरत हैं।इसी तरह अन्य लोग भी अपने अपने काम को करते हुए समय निकाल कर हाशिये के समुदाय के बालक बालिकाओं को पढ़ाने का काम कर रहे हैं।


घुमन्तू समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़ना और उन बच्चों में शिक्षा के प्रति लगन जगाना,बहुत मुश्किल काम है। ये परिवार बरसों से झुग्गी झोपड़ियों या तंबुओं में रहते हैं,परिवार के बड़े लोग मजदूरी करते हैं और बच्चे कचरा बीनने अथवा भीख मांगने का काम करते थे, कथित मुख्यधारा के समाज से ये लोग बिल्कुल कटे हुये रहते हैं,इनके लिए रोजमर्रा की ज़िंदगी के संकट इतने बड़े हैं कि शिक्षा,चिकित्सा जैसी बातें तो बेमानी ही है। न रहने को घर,न खाने को अनाज,न मरने के बाद शमसान ,नागरिकता की पहचान के चिन्ह तक नहीं होते हैं कईं बार तो।


ऐसे चुनौती पूर्ण समुदाय के बच्चों के भीतर पढ़ाई की अलख जगाने का काम मिडास टच फाउंडेशन के नाम से एकजुट हुए भीलवाड़ा शहर के इन युवक युवतियों ने किया हैं।अभी सिर्फ यह नाम ही है।बैनर भर के लिए।


घुमन्तू वर्ग के बच्चों के लिए इन नौजवानों ने एक स्कूल ही खोल दिया है,हालांकि यह एक अनौपचारिक लर्निंग सेंटर ही है,जहाँ प्रातः 7 बजे से 9:30 तक घुमंतू परिवारों के बालक बालिकाएं  आते हैं। आनंददायी तरीकों से पढ़ना लिखना सीखते है,प्रत्येक शनिवार को ड्रॉइंग की क्लास होती है.रविवार को खेलकूद, शारीरक शिक्षा,डांस  व मार्शल  आर्ट जैसी गतिविधि की जाती है.


जिस तल्लीनता,लगन और मनोयोग से मैंने इन युवाओं को घुमन्तू वर्ग के बच्चों के साथ घुलमिल कर पढ़ाते देखा, उससे कईं उम्मीदें जगती है । न केवल पढ़ाई,बल्कि सह शैक्षणिक गतिविधियां भी सतत करवाई जाती है। संशाधनों का निश्चित रूप से अभाव है,पहले तो यह घुमन्तू पाठशाला खुले में लगती थी,पर आजकल हाउसिंग बोर्ड के एक पुराने मकान में लगती है,प्रार्थना सभा तो अब भी सड़क पर ही होती है।


सुखद आश्चर्य की बात यह है कि घुमन्तू समाज के जो बच्चे पहले कचरा बीनने जाते थे,भिक्षावृत्ति के लिए जाते थे,गुटका तम्बाकू खाते थे,अब वे इन सब चीजों को छोड़ चुके हैं,साफ सुथरे रहते हैं,हिंदी व अंग्रेजी जबान में बोलते हैं और बहुत तेज़ी से पढ़ना,लिखना,बोलना,गाना, चित्र बनाना, खेलकूद आदि इत्यादि गतिविधियां सीख रहे हैं।


संतोष चंदेल जी ,आपकी टीम द्वारा किया जा रहा काम स्तुत्य है,मैं आपकी पूरी टीम के काम को सलाम कहता हूं।कल आप लोगों के बीच आ कर,बच्चों से मिलकर, आप लोगों से बात करके बहुत सकारात्मक ऊर्जा लेकर लौटा हूँ।आप जैसे लोग ही इस देश का भविष्य है,बाकी तो हमारी तरह हंगामा खड़ा करने में लगे हैं,आप लोग सूरत बदलने में लगे हैं। बहुत खूब,लगे रहिये। इंकलाब जरूर आयेगा।


– भंवर मेघवंशी

( संपादक – शून्यकाल डॉटकॉम )

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