‘मैं एक कारसेवक था’ पुस्तक पढ़ते हुए एक दर्द भरी आहट सुनाई देती है !

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(रेणुका पामेचा)

भँवर मेघवंशी द्वारा लिखित यह आत्मकथा एक संगठन के अन्दर की दोगली नीति को इतने स्व अनुभव से सामने लाती है कि लगता है जैसे आज भी वही घटित हो रहा है. एक युवा बाहरी तामझाम व बड़े-बड़े नारे देखकर कितनी निष्ठा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं से जुड़ा और संगठन की पोल कदम कदम पर खुलती गयी. अन्दर तक का आँखों देखा,कानों सुना हाल जिस सरल सहज तरीके से लिखा गया कि वह एक उपन्यास बन गया.

यह सही लिखा कि 1925 में रोपी गयी बेल आज विष वृक्ष बन गयी है. अपनी अन्दर की जंग या उधेड़बुन को समाज के बाहर से जोड़ना व बेबाक तरीके से संघर्ष को लिखना आसान काम नहीं है. वो वही लेखक लिख सकता है जिसे आज के समाज के दोगले पन को बहुत गहराई से जिया हो या महसूस किया हो.

1990 में बाबरी विध्वंस के लिए जाने वाले किशोर से आज मानवाधिकार मुद्दों का हिस्सा बनना रोमांचकारी है. भँवर मेघवंशी उससे निकल पाए क्यों कि ऐसे लोगों का साथ मिला जिन्होंने उनके बेबाक व्यक्तित्व को समझा. उन्होंने व्यक्तिगत पीड़ा सही पर टूटे नहीं और सामाजिक चेतना के वाहक बने.

55 शीर्षक,170 पृष्ठ इसे रोचक बना देते है. 15 वर्ष की आयु में संगठन से जुड़ना,सच्चे कार्यकर्ता के रूप में हर संघर्ष से जुड़ने का बहुत ही सटीक वर्णन किया है.

हर सामाजिक कार्यकर्ता को अपनी यात्रा को इतने बेबाक तरीके से लिखने का साहस दिखाना चाहिए. भंवर ने यह पुस्तक उस समय प्रकाशित की जब तथाकथित हिन्दू राष्ट्र,आरएसएस का प्रचण्ड रोद्र रूप देश में हर किसी को राष्ट्रद्रोही बना रहा है,इस साहस के लिए साधुवाद.

संघ को प्रचारक चाहिए,विचारक नहीं,तर्क नहीं चाहिए. आरएसएस का दोगलापन इतनी अच्छी तरह से सामने लाया गया है कि किताब को पढ़ना शुरू करने पर छोड़ने का मन नहीं होता है.

दलित हिन्दू नहीं है,उनका इस्तेमाल किया जा सकता है. कारसेवक की भूमिका से निकलकर आन्दोलन कर्मी बनने की यात्रा को बहुत तर्क सहित लिखा है. आज के साम्प्रदायिकता के वातावरण में फ़ासीवाद की आहटों को भंवर ने बखूबी समझा है और लिखा है.

पूरी पुस्तक पढने पर एक दर्द की आहट भी दिखाई देती है कि आज भी एक मन्दिर,एक शमशान, एक पनघट क्यों नहीं है ? आज भी कट्टरवाद क्यों है ? दलितों के दर्द को दूसरे न समझ सके पर दलित भी नहीं समझ पा रहे है. क्यों सब चुप है. क्यों सन्नाटा है. क्यों दलित बेबस है.

बेबाक लेखन के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद .

( रेणुका पामेचा )

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