साहस के पहाड़ पर खड़ा एक कारसेवक !

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( उम्मेद सिंह )
आज राजस्थान में ही नहीं वरन् देशभर में दलित आयोजन, आन्दोलन, सम्मेलन व सेमीनार में अनिवार्य नाम बन चुके भँवर मेघवंशी अपनी नई किताब ‘मैं एक कारसेवक था ‘ में संघर्ष के पहाड़ पर खड़े एक कारसेवक नज़र आते है। पुस्तक उनकी आत्मकथा है। ये आत्मकथा उनके व्यक्तित्व के कई आयाम हमारे सामने खोलकर रख देती हैं। जैसे जैसे पेज दर पेज और हर्फ़ दर हर्फ़ हम किताब से गुजरते जाते हैं तो साहस के पहाड़ पर खड़ा ये कारसेवक भी हमारे भीतर उतरता जाता है और हम उस पक्ष को भी जान पाते हैं जो अभी तक अनदेखा था।         

आज के संक्रमित और भयावह समय में भँवर मेघवंशी की किताब ‘मैं एक कारसेवक था’ एक नई रौशनी लेकर हमारे सामने आती है। ‘मैं एक कारसेवक था’ के सूक्ष्मदर्शी यंत्र के नीचे दलित समाज के विविध आयामों को बेहतर तरीक़े से देखा जा सकता है। ये आत्मकथा लेखक के भोगे हुए यथार्थ और उससे उपजी पीड़ और पीड़ के शक्ति में रूपान्तरण का मार्मिक अंकन है।      बचपन में आरएसएस की शाखा का ये स्वयंसेवक दलित समाज के लिए संघ की दृष्टि के साथ संघ के छुपे हुए एजेंडे की न केवल चीरफाड़ करता है अपितु उसका वास्तविक चेहरा बेनक़ाब कर देता है कि संघ के तथाकथित हिंदू राष्ट्र में दलितों के लिए क्या स्थान है। वे मात्र उनके लिए देह है जिसका दोहन और उपयोग वे अपने मिशन के लिए किस प्रकार करते रहेंगे ।        हिंदू राष्ट्र, राम और भगवा झण्डे को कभी अपने जीवन का परम काम्य और सर्वोच्च प्राप्य मानने वाला युवक भँवर मेघवंशी अयोध्या की बाबरी मस्जिद को ढहाने में कारसेवक बनकर जाता है।सूक्ष्मता से बुने गये इस दृश्य में लेखक ये समझाने में कामयाब रहा है कि तथाकथित सवर्ण मानसिकताओ में लिपटें लोथड़े हम दलितों का कैसे इस्तेमाल करते है। राम की सौगंध खाकर मन्दिर बनाने का प्रण लेने वाले लोग कितने कायर, बुज़दिल है कि कारसेवकों को भ्रम में उलझाकर कैसे ट्रेन से एक एक कर खिसक लेते है। इस दृश्य की सूक्ष्म बुनावट में खिसकते नामचीन और ट्रेन में बचे रह गये कारसेवकों के माध्यम से लेखक प्रतिपादित करता है कि दलित, संघ के लिए महज़ यूज हो जाने वाले टूल है। उनके जीवन की उपादेयता संघ के हवन कुंड में भस्म बन जाना ही है ।अयोध्या जाते वक्त ट्रेन में मुस्लिमों को देखकर लेखक के मन में उठने वाले विचार कि यदि वे लोग एक शब्द भी बोलते तो हम उन्हें वहीं काट देते..आरएसएस की विचारधारा को नंगा करता है। कैसे एक धर्म के ख़िलाफ़ नसों में ज़हर और दिमाग़ में बारूद भरा जा रहा है । लेखक आज ये महसूस करता है कि वह अयोध्या पहुँच गया होता तो पुलिस गोली का शिकार हो गया होता और उसकी लाश सरयू नदी में बहा दी गई होती। खुली जेल में जानवरों का सा खाना खाकर भी लेखक के मन से संघ का भूत नहीं उतरता। भीलवाड़ा में प्रदर्शन के दौरान मारे गये दो लोगों को जिनका संघ से कोई संबंध नहीं था उन्हें अपना बताकर उनकी कलश यात्रा से अपने लिए अवसर ढूँढने वाले संघ का झूठ और फ़रेब का असली चेहरा भी लेखक बेनक़ाब करता है।       लेखक के जीवन में मोड़ तब आता है जब कलश यात्रा उनके गाँव पहुँचती है और लेखक अपने ही घर पर उनके लिए भोजन की व्यवस्था करता है। पिता और पुत्र के वैचारिक द्वन्द्व में यहाँ पाठकों के सम्मुख पिता का अनुभव सच साबित होता है और उनके घर पर बने खाने को फेंकने की घटना लेखक को भीतर तक तोड़ देती है। वे इस कदर टूटते हैं कि आत्मघात भी कर लेते है। पर ज़हर उनको नहीं मार पाता। यहीं से लेखक खुद से जूझता नज़र आता है। यहाँ लेखक दलितों के साथ एकाकार हो जाता है । ये ही घटना है जो पाठकों पर गहरा प्रभाव छोड़ती है कि तथाकथित हिंदू राष्ट्र में उनके लिए कोई स्थान नहीं है।अपने वजूद और अपने हिस्से के देश की तलाश में लेखक पहले पहल तो संघ की ख़िलाफ़त में अपने प्रतिशोध में जूनुनी कारसेवक ही नज़र आता है। पर धीरे धीरे उनका जूनुन समाज का जूनुन बन जाता है । जूनुन और भटकाव की अवस्था में लेखक विभिन्न धर्मों में सुकून तलाशते हुए आखिर अंबेडकर तक पहुँचते हैं और जीवन का नज़रिया ही बदल जाता है। वे बचपन में संस्कृत पढ़ चुके थे। यहाँ वे अंबेडकर, फुले, कबीर, रैदास, ओशो, बौद्ध दर्शन से नया नज़रिया और नई रौशनी ग्रहण करते है। निखिल डे, अरुणा राय का साथ उनकी समझ के दायरे को विस्तार देते है।
आज भँवर मेघवंशी की सक्रियता व समझ हमें आश्वस्त करती है। पिछले चुनाव में राजनीति में सक्रियता को लेकर तीन महीने तक संशय बना रहा। इस संशय पर वे विजय पाते हैं और खुद को समाज को समर्पित करते है। उनके इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए । कोई भी व्यक्ति या संस्था दलित समाज के लिए तब तक संघर्ष नहीं कर पायेंगे यदि उनके मन में किसी लाभ के पद की लालसा होगी। अभी दलित समाज को लम्बा सफ़र तय करना है और उस सफ़र में बिना किसी लालसा वाले समर्पित कार्यकर्ता की आवश्यकता है।आज दलित युवा दोराहे पर है, शम्भु रेगर के इस्तेमाल का उदाहरण बहुत पुराना नहीं है। अपनी प्रोफ़ाइल पर देवताओं की फ़ोटो लगाकर धार्मिक जयकारे लगाने वाले युवाओं को ये पुस्तक रास्ता दिखलाती है। ये पुस्तक देश के दलित युवाओं को दो रास्ते दिखलाती है जिनमें से एक पर चलकर उन्हें खाई में गिरना है और दूसरे पर चलकर भँवर मेघवंशी बनना है। दलित के लिए यदि कुछ ग्रहणीय है तो वे अंबेडकर के विचार है और उनका सुझाया मार्ग है। आज जब मार्ग भटकाने वाले कदम कदम पर मौजूद है तो ये पुस्तक एक पथ प्रदर्शक बन कर सामने आती है। दलित समाज के हर व्यक्ति को ये पुस्तक ज़रूर पढ़ना चाहिए। हर उस व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जो इस देश से प्यार करते है, देश की गंगा-जमुना तहज़ीब से प्यार करते है, इन्सान से प्यार करते है, इन्सानियत से प्यार करते है।भंवर मेघवंशी न केवल संघ के एजेंडे को बेनक़ाब करते है अपितु आसन्न ख़तरे से सावधान करते है, ख़तरा जो बिना आपको खबर लगे चारों ओर पसरता जा रहा है, ख़तरा जिसमें आसमान सा अहंकार है। आसमान से अहंकार वाले शासक व आसन्न ख़तरे को भँवर मेघवंशी अपनी ललकार सुनाते है और उनकी ललकार में इतनी ताक़त है कि बहरे कान भी उसे सुन सकते है। हिम्मत के साथ सच कहने वाले साहस के पहाड़ पर खड़े भँवर मेघवंशी को सलाम।

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