आरएसएस की असलियत को उजागर करती एक किताब-“मैं एक कारसेवक था”

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( नीरज बुनकर )
इस किताब को मैंने ज्यादातर ऑफिस  में  ही बैठकर पढ़ा। अधिकांश लोग  जो  मेरे सहकर्मी है, वो उन समुदायों   से  ताल्लुक  रखते है ,जिनकी विचारधारा दक्षिणपंथ के नजदीक है।जब  मैं किताब  आर्डर  कर  रहा  था  तब  भी मुझे  लोगो  ने पूछा  कि-‘  यह  कौनसी  किताब  है  ? उस वक्त तो मैने उनको कोई जवाब नहीं दिया,पर किताब आने पर उनको  मैंने  किताब  का  अंश  पढ़वाया,  पढ़ते  ही उनका क्रोध से भरा रिएक्शन था कि आज के  दौर  में  जाति  की  बात  करना  आपसी  सौहार्द  को  बिगाड़ना है ।

नीरज बुनकर

किताब के अध्ययन के दौरान भी  बहुत  लोगों  ने  मेरे  से  किताब के  बारे  में  पूछा,  मैंने  बताया भी, उनको किताब हाथ  में  देते  हुए मैंने उनको आगाह भी किया कि इससे आपकी भावनाएं आहत हो सकती है… उनमें से कुछ लोगों ने थोड़े बहुत पन्ने पढ़े, अपनी भौंहैं भी तानी ,लेकिन साथ ही सबका एक  ही  कहना  था  – “कुछ  भी  कहो…. लेखक  की  लेखन  शैली  बहुत  ही  उम्दा  है….।”
वास्तव में यह किताब आपको बोर नहीं करती है,न ही उबाती है बल्कि इसका हर पन्ना आपको आगे की कहानी जानने के लिये उत्साहित करता है। इसको पढ़ने के बाद आपकी नींद उड़ जाती है.यह लेखक के शब्दों की ताकत है कि वह पाठकों को सोने नहीं देती बल्कि सतत जगाये रखती है, किताब के आख़री पन्ने तक और किताब के पढ़ने के बाद भी…।
एक ख़ास बात यह है कि यह किताब सिर्फ तथ्यों को पाठकों के सामने रखती है और निर्णय उनकी बौद्धिक तर्कशीलता व विवेक पर छोड़ देती है.
इस किताब ने आरएसएस जैसे दक्षिणपंथी संगठन की जातिवादी मानसिकता को तो उजागर किया ही , साथ ही इसकी सांगठनिक मज़बूती को भी सिलसिलेवार सामने रखा, ताकि सबको मालूम हो सके कि आज जिस स्थिति तक आरएसएस पहुँचा है,वो चाहे इसका राजनैतिक रूप से मज़ूबत होना हो या कोई और क्षेत्र में पकड़ बनाना हो, इसके पीछे उसकी क्या क्या रणनीतियाँ रही है, इसका भी लेखक सिलसिलेवार ब्यौरा पेश करता है । यह किताब तमाम बहुजन संगठनों को एक आईना भी दिखाती है कि हम आरएसएस के समकक्ष एक ऐसा विशालकाय अनुशासनात्मक संगठन खड़ा कर पाने में क्यों कामयाब नहीं हो पा रहें ? इसके पीछे की वजहों में लेखक ने पिछड़ों की दलितों से पृथकता व उनका घनघोर ब्राह्मणवादी जाल में फ़सना बताया व साथ ही पिछड़ों की तुलना उस मोर की भांति कर दी जो आत्ममुग्ध है और नाचते हुए कभी भी अपने पाँव नहीं देखता है क्योंकि अगर वो देख ले तो भद्दापन दृष्टिगोचर हो जाने से सुंदरता का सपना टूटने लगता है | लेखक की यह तुलना अद्धभुत है जो पिछड़ें वर्ग की वास्तविक स्थिति को तो बयाँ करती ही है साथ ही उनकी ब्राह्मणवादी आधिपत्य में  अपने आपको सर्वोपरि मानने की भूल को भी बड़े ही चतुराई से उजागर करती है | 
चूंकि यह किताब लेखक के आरएसएस में रहते हुये अनुभवों का कच्चा चिट्ठा है ,जो हमें संघ की षड्यंत्रकारी गतिविधियों व संगठन तंत्र की विस्तार से जानकारी देती है व दलित-आदिवासियों की संघ में स्थिति व हैसियत को भी सामने रखती है।
इस किताब से यह भी मालूम चलता है कि आरएसएस अम्बेडकरी साहित्य व विचारधारा से कितना ख़ौफ़ खाता रहा है, उस दौर में भी जब लोगों को महाराष्ट्र के अन्यत्र अम्बेडकरवादी आंदोलन व विचारधारा की समझ उतनी नहीं थी और इसका फ़ैलाव भी आमजन तक नहीं पहुंच पाया था। आरएसएस प्रारम्भ से इस बात से परिचित था कि जितना ज्यादा अम्बेडकर के विचारों को बाधित किया जायेगा,उतना ही आरएसएस उन्नति व प्रगति करेगा ,वह फैलता जायेगा। इसीलिए एक जगह संघ के प्रचारक महोदय द्वारा लेखक को यह सलाह दी जाती है- ” आपको यहाँ नहीं रहना चाहिये .इस अम्बेडकर छात्रावास में तो आपकी विचारधारा ही भ्रष्ट हो जायेगी.”
अम्बेडकरवादी विचारधारा का ही कमाल था कि लेखक प्रतिशोध की आग से निकलकर धीरे-धीरे परिवर्तन की चाह की ओर बढ़ा और साथ ही अपनी निजी दुश्मनी को सामाजिक समानता व अस्मिता एवं गरिमा की सामूहिक लड़ाई बना पाने में कामयाब हो पाया |
लेखक ने जिस मार्मिकता से 2002 में गुजरात में हुए भीषण नरसंहार का वर्णन किया, उसे पढ़कर अल्पसंख्यकों पर हिन्दू बहुसंख्यकों की बर्बरता का भयानक मंजर आँखों के सामने तैरने लगता है व बिना किसी हिचक के दंगाई हिन्दुओं को तालिबानियों की संज्ञा देकर लेखक ने उनके द्वारा की गयी हिंसा को आतंकवाद की श्रेणी में डालने का अदम्य साहस किया है व गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को इसके लिये जवाबदेह ठहराते हुए यह बता दिया है कि इस भयावह नरसंहार की सच्चाई को आपके विकास के मॉडल से ढका नहीं जा सकता है, घाव जिन्दा रहते है व अंततः वे प्रतिशोध में परिवर्तित हो जाते है।
लेखक के गृह ज़िले में हुए तमाम साम्प्रदायिक दंगों के पीछे की मंशा को भी लेखक ने बड़ी ही बारीकी से बयाँ किया है व एक जगह हुए पुलिस उपद्रव में मारे गए दो लोगों के बारे में लिखते हुए कहा कि -‘ दोनों मरने वाले हिन्दू थे इसीलिए ‘शहीद’ हो गए मुसलमान होते तो ‘ढेर’ हो जाते ‘ ये शब्द पाठकों के मन में घर कर जाते है और सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि साम्प्रदायिक राजनीति के माहिर खिलाड़ी कैसे शब्दों के ज़रिए लोगों की भावनाओं से खेल रहे हैं।
लेखक ने अपनी किताब में भारत की सिविल सोसायटी को भी नहीं बख्शा ,उन पर भी प्रहार करते हुए इसे भारतीय समाज का सबसे दोगला क्षेत्र घोषित कर दिया, यह आरोप प्रदर्शित करता है कि सामाजिक कार्यों के नाम पर भारत में कितने ही कथित कार्यकर्त्ता अपनी दुकानें चला रहें है व गरीब, असहाय, दलित, मज़लूमो के दुःख-दर्दों व तकलीफों को खुलेआम अपने न्यस्त स्वार्थों के चलते बेच रहें है ।
अंत में किताब की ही कुछ पंक्तियाँ जो ‘लव जेहाद’नामक अध्याय में है,वे मेरे दिल को सीधे छू गई ,जहां लेखक ने लिखा है कि -” आशा है कि तमाम लव जेहादी जुमलों के बावजूद भी दिल मिलेंगे और लोग जाति, धर्म, सम्प्रदाय और देश की सरहदों को लांघकर मोहब्बत करेंगें. इश्क़ पर मज़हबों का पहरा स्वीकार नहीं किया जाएगा,  ये दीवारें एक दिन ढह जाएगी “
   मैं इन पंक्तियों को किताब का सार कहूँगा जो बतलाती है कि तमाम धार्मिक, सामाजिक व राजनितिक ठेकेदारों की जालसाज़ी व चालबाज़ी के बावज़ूद इस मुल्क़ में प्यार मोहब्बत जिंदा रहेगी जो एक सुन्दर भारत का निर्माण करेगी व इनके इरादों को मार गिराएगी ।

(नीरज बुनकर -) लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,मुम्बई से अध्ययन के पश्चात राजस्थान में सामाजिक कार्यों में सलंग्न है

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