कम्यूनल हिप्पोक्रेसी को बेनकाब करती रचना ‘मैं एक कारसेवक था’

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( बी.एल. पारस )
निब्बाण प्रकाशन और बोधि फाउंडेशन द्वारा जुन 2019 में आयोजित प्रथम राजस्थानी दलित साहित्य सम्मेलन में एक सत्र में दलित आत्मकथाओं के संदर्भ में चर्चा करते हुए मैंने कहा था कि आत्मकथाओं के बिना दलित साहित्य अधूरा है । कारण-  कविताओं और कहानियों के बनिस्पत आत्मकथा रचनाकार के बहाने समूचे समाज की पीड़ा  को काल्पनिक नहीं, बल्कि यथार्थवादी ढंग से पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती है । 
कुछ रोज पहले ही पत्रकार-सामाजिक कार्यकर्त्ता भंवर मेघवंशी की आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ पढ़कर इस बात को फिर से संबल मिला । हिन्दी में अपने-अपने पिंजरे,  जूठन, मणिकर्णिका-मुर्दहिया, मेरा बचपन मेरे कंधों पर जैसी आत्मकथाओं ने पाठकों को भीतर तक झकझोरा है । इसे  दलित आत्मकथाओं की विषयवस्तु को और ज्यादा विस्तृत फलक देती रचना कहा जा सकता है ।
‘मैं एक कारसेवक था’ एक दलित युवा के कट्टरपंथी कारसेवक से प्रबुद्ध सामाजिक कार्यकर्ता बनने का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करती है । और यह भंवर मेघवंशी की नहीं, हर उस युवा की जीवन गाथा है, जो अनभिज्ञतावश माइंड वॉश फैक्ट्री में चला जाता है और फिर बाहर आता है डायनामाइट बनकर । भंवर मेघवंशी के साथ भी यही होता है । वे किशोरावस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि/त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोअहम्” की प्रतिज्ञा लेते हुए समर्पित सदस्य बन जाते हैं । फिर ‘हिन्दू  राष्ट्र निर्माण’ ही उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाता है । वे “रामजी के नाम पर जो मर जायेंगे, दुनिया में नाम अपना अमर कर जायेंगे” जैसै नारें लगाते हुए इसके लिए गालियां, लाठियां  खाने को तैयार रहते हैं, यहां तक कि जेल जाने और मर जाने को भी ।
 संघी शाखा और साहित्य भंवर मेघवंशी को संशय नहीं श्रद्धा रखना सिखाता है। वे हिन्दुओं के सैन्यकरण और सैनिकों के हिन्दूकरण एजेंडे में सहभागी बनते हैं । फिर उन्हें हर मुस्लिम विधर्मी और लव जेहादी नजर आता है । उन्हें उत्तर प्रदेश के दंगा विरोधी  मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ‘मुल्ला-यम’ नजर आते हैं । वे विचारक नहीं, प्रचारक बनना भी स्वीकार कर एक पत्रिका का ‘पाकिस्तान मिटाओ’ अंक निकालने लगते हैं । 
 वरिष्ठ संघी सदस्यों की मानकर आंबेडकर छात्रावास और ओशो साहित्य से दूरी बना लेते हैं । यहां तक कि अपने पिताजी से भी भिड़ने को तैयार हो जाते हैं । इतने समर्पित भाव से कार्य करने के बाद भी जब गांव में अस्थि कलश यात्रा के साथ आये संघी साथी जब उनके घर बना खाना नहीं खाते और साथ में पैक करवाकर बाद में खा लेने की बात कहकर गांव की कांकड़ पर फेंक जाते हैं, तो भंवर जैसै आसमान से जमीन पर आ गिरते हैं । 
“मैंने खुद से सवाल किया कि क्या मैं इसी हिन्दू राष्ट्र के लिए काम कर रहा हूं और मरने-मारने पर उतारू हूं ? इसमें मेरा तो स्थान ही नहीं है ? मैं क्या हूं ? आखिर कौन हूं मैं ? एक रामभक्त कारसेवक हिंदू या शूद्र या अछूत ? जिसके घर का बना खाना भी स्वीकार नहीं हिन्दू राष्ट्र की ध्वजा फहराने वालों को ।” ( पृष्ठ संख्या 72 ) 
अब सावरकर, मुंजे, तिलक, गोखले, हेडगेवार, गोलवलकर की जगह वे बुद्ध, फुले, कबीर और अंबेडकर में अपने आदर्श तलाशने लगते हैं । उनका सारा मुस्लिम द्वेष बह जाता है । “वे मुझ जैसै ही लोग थे, बिल्कुल हमारे जैसै ही । हमारी ही तरह हंसनें,रोने, गुस्सा करने वाले लोग, उतने ही देशप्रेमी जितने हम हैं, उतने ही परिस्थितियों के मारे हुए ।” ( पृष्ठ संख्या 79 ) 
आखिर वे सामाजिक समानता-अस्मिता की लड़ाई आखिरी सांसों तक लड़ने का संकल्प लेते हैं । अब भंवर मेघवंशी विश्व के सबसे बड़े गैर पंजीकृत एनजीओ आरएसएस से कलम से लड़ना आरंभ करते हैं । प्रतिरोध के साथ-साथ रचनात्मकता का दामन थाम लेते हैं । दलित एक्शन फोर्स की स्थापना, बग़ावती तेवर की कविताएं, डायमंड इंडिया पत्रिका का प्रकाशन, शिक्षक सेवा से त्याग-पत्र, ‘दहकतें अंगारें’ का संपादन, मजदूर किसान शक्ति संगठन कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना, सद्भावना रैली, डगर, फासीवाद की आहटें पुस्तक जैसै कार्य एक कारसेवक को एक संवेदनशील पत्रकार और प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता बना देते हैं । न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि ओडिशा में फादर ग्राहम स्टैंस को जिन्दा जला देने की घटना और गुजरात नरसंहार जैसी  राष्ट्रीय स्तर पर हो रही साम्प्रदायिक हिंसक घटनाओं के खिलाफ भी भंवर के प्रतिरोध की गूंज सुनाई पड़ने लगती है ।
जब विश्व हिन्दू परिषद के कट्टरपंथी नेता राजस्थान को भी गुजरात बना देने घोषणाएं और त्रिशूल दीक्षा के नाम पर धारदार हथियारों का वितरण कर रहे थें, भंवर मेघवंशी जन जाग्रति हेतु ‘अमन के लिए साइकिल यात्रा’ निकालते हैं । इन कट्टरपंथियों और इनकी हिमायती तात्कालिक सरकार द्वारा उत्पन्न ढ़ेरों प्रतिरोधों के बावजूद वे बेख़ौफ़ अपना काम करते हैं । “मैं किसी अस्पताल में खांसते हुए मरने का इच्छुक कभी नहीं रहा । मौत जिंदगी का अंतिम सत्य है । उसे जब आना है, आए, स्वागत है ।” ( पृष्ठ संख्या 93 ) 
वे हर प्रकार के संघी दुष्प्रचार को बेनकाब करते हैं । “मेरे मन में आज भी यह सवाल उठता है कि जब मेहतर समाज के कथित आदि पुरुष वाल्मीकि ऋषि के हाथ में रामायण रचने वाली कलम थी, तो आज तक उनके वंशजों के हाथ में झाड़ू और सिर पर कचरे की टोकरी क्यों है ?” ( पृष्ठ संख्या 162 ) वाक्य जहां उनके इतिहास बोध को दर्शाता है, वहीं “मैं राज नहीं समाज बदलने के काम को यथावत जारी रखना चाहता हूं” ( पृष्ठ संख्या 170 ) उनकी दूरदर्शिता को ।  आत्मकथा में भंवर मेघवंशी के पिताजी का निर्भीक-दूरदर्शी चरित्र और उनकी जीवनसंगिनी प्रेम की प्रेमभरी-सहयोगी प्रवृत्ति पाठक हृदय पर अमिट छाप छोड़ती है । 
दलित साहित्यिक रचनाओं को शिल्पगत दृष्टि से खारिज़ करने के जो प्रयास तथाकथित आलोचकों द्वारा किये जाते हैं, उनके लिए यह आत्मकथा कोई स्पेस नहीं छोड़ती । मोटे तौर पर इसमें 1992 से लेकर 2014 तक की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण है, लेकिन यह 1925 में संघ के बनने से विभिन्न आनुषांगिक संगठनों से होते हुए राजनीतिक दल बनने जैसी सब घटनाओं को सहेजे हुए है । 
यह आत्मकथा न भंवर मेघवंशी का एकालाप है, न कोई आंचलिक विसंगतियों का चित्रण, बल्कि यह राष्ट्रीय कैनवास लिए हुए बड़ी बेबाकी से कट्टरपंथी  कम्यूनल हिप्पोक्रेसी को बेनकाब करती है । भाषा का प्रवाह पाठक को बांधें रखता है ।
 “हमारा देश भी अजीब किस्म की मूर्खताओं पर पलता है । यहां किसी ने चिमटा थाम लिया, तो वे चिमटा बाबा हो गये । किसी ने सालों तक स्नान नहीं किया, मुंह तक नहीं धोया और दुनिया भर की गंदगी के साथ जी रहे हैं, इसलिए औघड़ बाबा हो गये । एक रंगीले रतन थे, तो रंगीलेशाह बाबा कहे गये, तो दूसरे औरतखोर थे, इसलिए रंडीशाह बाबा कहलाये । कइयों ने जटाजूट बढ़ा रखी है, तो हजारों नंग-धड़ंग घूम खड़े हैं । नागा बाबाओं की पूरी फौज तो कुंभ में शाही स्नान के लिए दौड़ते हुए नदी में कूद पड़ती है । ऐसी नंगदौड़ भला पूरे विश्व में और कहां मिलेगी ? बिना कपड़े पहने कड़वें प्रवचन दिये गये । एक बाबा पेट से सांस ऊपर खींचने और वापिस छोड़कर पेट फुलाने मात्र से ही योगिराज होकर राजऋषि हो गया और पूरे देश को लौकी का रस पिला-पिलाकर हजारों करोड़ का मालिक बन बैठा । एक स्वामीजी लोगों को खुद का मूत पीने का आत्मज्ञान बांट रहे हैं, तो आसाराम एंड संस वीर्य रक्षा के उपाय बताते-बताते यौन उत्पीडन के गंभीर आरोपों में जेल पहुंच गये है । कोई नित्यानंद है, जो नित्य प्रतिदिन ही काम का आनंद भोग रहा है, तो किसी का नारा ‘धन निकाल’ है । किसी का डेरा सच्चा है, तो किसी ने खाप पंचायतों के प्रदेश में सतलोक निर्मित कर लिया है, कोई निरीह गाय के नाम पर देश भर में घूम-घूमकर धन इकट्ठा कर रहा है, तो कोई गंडे, ताबीज़ और झाड़-फूंक के जरिए ही रोजी-रोटी चला रहा है । अजब हाल है, गज़ब देश है ।” ( पृष्ठ संख्या 119 )
सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि  ‘मैं एक कारसेवक था’ आत्मकथा उस विकट दौर में प्रकाशित हुई है, जब लोकतंत्र के चारों स्तंभों की नैतिकता कटघरे में है और पूरा देश अनावश्यक बहसों में उलझा हुआ है । ऐसे में प्रत्येक जिम्मेदार भारतीय के कंधों पर देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने की जिम्मेदारी है । यह रचना पाठक को न केवल उसके इर्द-गिर्द बुने जा रहे धार्मिक कट्टरता के जाल के बारें में अगाह करती है, बल्कि उसके खिलाफ उठ खड़े होने को भी प्रेरित करती है ।

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